Wednesday, August 31, 2016

360.  दिल के आँगन में तेरी धूप उतर आती है 


दिल के आँगन में तेरी धूप उतर आती है
सर्द मौसम में मेरे जिस्म को गरमाती है

मेरी तौबा से तो होंगे नहीं मैख़ाने बन्द
मैं ही क्या हूँ तेरी दुनिया ही ख़राबाती है

है कोई और भी इस शहर में दीवाना कहीं
शबे-आख़िर ये जो रोने की सदा आती है

भूल जाता हूँ मुहब्बत के गिले-शिकवे तमाम
ज़ेह्न में जब कोई तस्वीर उभर आती है

हुस्न वालों की ये दुनिया ही अजब है 'माँझी'
बात करता हूँ तो हर बात पे शरमाती है
                                  --देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से )

dil ke aaNgan meiN teri dhoop utar aati hai ...
sard mausam meiN mere jism ko garmaati hai ...

meri taubaa se tou hoNge nahiiN maikhane baNd
maiN hi kyaa huuN, teri duniya hi KHaraabaati hai ...

hai koi aur bhi is shehar meiN deewaana kahiiN ...
shab-e-aaKHir ye jo roney ki sadaa aati hai ...

bhool jaata huuN muhabbat ke gile -shikwe tamaam ...
zehn meiN jab koi tasveer ubhar aati hai ...

husn waaaloN ki ye duniya hi ajab hai 'Manjhi' ...
baat kartaa huN tou har baat pe sharmaati hai ...

                                                 ~ Devender Manjhi

Tuesday, August 30, 2016

359. तीरगी में उजास! पागल है ?


तीरगी में उजास! पागल है?
उनसे मिलने की आस! पागल है?

नागफनियों की छाँव में ख़ुशबू
और गुलाबों में बास! पागल है?

जिसकी गिनती है नौ न तेरह में
उसको कहता है ख़ास! पागल है?

एक दीपक बुझा, नगर सारा
हो गया बदहवास! पागल है?

देखकर मौज की अदा 'माँझी'
आज है जो उदास, पागल है?
                --देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से)

Monday, August 29, 2016

358. इतना घोर अँधेरा क्यों है 


इतना घोर अँधेरा क्यों है
उजड़ा दिन का डेरा क्यों है

डर लगता है सन्नाटों में
तन्हाई का फेरा क्यों है

साँप बसे हैं आस्तीन में
व्याकुल आज सपेरा क्यों है

जिसने लूटी बस्ती सारी
मुझमें वही लुटेरा क्यों है

काट न पाए  'माँझी ' जिसको
लहरों का वो घेरा क्यों है
                 ---देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं ' से)

Sunday, August 28, 2016

357. सम्बन्धों पर आरी रख ले 


सम्बन्धों पर आरी रख ले
मान ले, बात हमारी रख ले

टस  से मस कर पाए न कोई
दिल पर पत्थर भारी रख ले

ये भी ख़ुश हों, वो भी ख़ुश हों
ऐसी दुनियादारी रख ले

मस्त पवन की तरह चला चल
आपाधापी सारी रख ले

सुलगें ज़ेह्न सभी के 'माँझी '
सोचों की चिंगारी रख ले
                  -देवेन्द्र माँझी


('हादिसा हूँ मैं ' से )

sambandhoN par aaree rakh le
maan le, baat hamaaree rakh le

Tas se mas kar paaye na koii
dil par patthar bharii rakh le

ye bhi khush hoN, vo bhi khush hoN
aisii duniyaa.daaree rakh le

mast pawan ki tarah chalaa chal
aapaa-dhaapee saarii rakh le

sulgeN zehn sabhi ke "Manjhi"
sochoN ki chingaarii rakh le