Wednesday, February 24, 2016

302.  किसको मारें कैसे पत्थर--सीख लें 


किसको मारें कैसे  पत्थर--सीख लें
यूँ बदलते युग का कल्चर-- सीख लें

दोस्ती करने  का जिनको शौक़ है
साँप  काटे का मन्तर--- सीख लें

यूँ नहीं चल पाएगी ये ज़िन्दगी
आओ, हम दुनिया का चक्कर सीख लें

रहबरों से  बच  सकें  जो राह में
चाल ऐसी सारे लश्कर--सीख लें

फ़िक्रो-फ़न सब कुछ हमें मिल जाएगा
लूटना दरवेश का दर--- सीख लें
                     -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. रहबरों=पथ-प्रदर्शकों, 2. दरवेश=फ़क़ीर, संन्यासी।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Kis ko maare'n kaise patthar---seekh le'n 
Yuu'n badalte yug ka "culture"--seekh le'n 

Dosti karne ka jinko shauq hai 
Saa'np ke kaaTe ka mantar-- seekh le'n 

Yuu'n nahi'n chal paayegi ye zindagi 
Aao, ham duniya ka chakkar seekh le'n 

Rahbaro'n se bach sake'n jo raah me'n 
Chaal aisi saare lashkar-- seekh le'n 

Fikr-o-fan sab kuchh hame'n mil jaaega 
Loot.naa darvesh ka dar -- seekh le'n 
                              -- Devender Manjhi

Thursday, February 18, 2016

301. आज पिघल जा तन्हा-तन्हा 


आज पिघल जा तन्हा-तन्हा
शम्अ़-सा जल जा तन्हा-तन्हा

मौसम की तो मजबूरी है
तू ही बदल जा तन्हा-तन्हा

लोगों को नग़में देने को
दर्द में ढल जा तन्हा-तन्हा

थाम समय को, पाँव दबाए
साफ़ निकल जा तन्हा-तन्हा

बनकर धूप मेरे ख़्वाबों की
छाँव को छल जा तन्हा-तन्हा

काई जमी है तट पर 'माँझी'
देख! सम्हल जा तन्हा-तन्हा
                    -देवेन्द्र माँझी
(मजबूरियाँ मेरी' से)

Aaj pighal jaa tanhaa-tanhaa 
Sham'a saa jal jaa tanhaa-tanhaa 

Mausam ki tou majboori hai 
Tuu hi badal jaa tanhaa-tanhaa 

Logo'n ko naghme dene ko 
Dard me'n DHal jaa tanhaa-tanhaa 

Thaam samay ko, paa'NV dabaaye 
Saaf nikal jaa tanhaa-tanhaa 

Ban.kar dhoop mere KHwaabo'n ki 
Chhaa'NV ko chhal jaa tanhaa-tanhaa 

Kaaii jami hai taT par "Manjhi" 
Dekh ! sambhal jaa tanhaa-tanhaa 
                    - Devender Manjhi

300. कुछ नहीं रक्खा है यारो नव-पुरातन साल में 


कुछ नहीं रक्खा है यारो नव-पुरातन साल में
ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी आपको हर हाल में

वो भला विश्वास का अमृत चखेगा किस तरह
ढूँढ़ता है खाल तक जो शख़्स अपने बाल में

हैं नहीं गन्ने कि इनसे आपको मीठा मिले
बस! खटाई ही मिलेगी इमलियों की छाल में

चीज़ कोई ख़ास ही है, चाल बतलाती है ये
क्या छिपाकर लाये हैं देखें तो वो रूमाल में

इस तरह नीची निगाहों से समर्पण कर दिया
फँस गई हो जैसे मछली आज 'माँझी' जाल में

 

Tuesday, February 9, 2016

299. मैं तो उसको देख न पाया जाने कैसा चेहरा था 


मैं तो उसको देख न पाया जाने कैसा चेहरा था
दर्द का पंछी जिस दम आया तब अँधियारा गहरा था

मैंने जब मुस्काना चाहा आँखें बरबस चीख़ उठीं
मेरी क़िस्मत पर तो यारो गर्दिश का ही पहरा था

ये तो मेरी ख़ुशफ़हमी थी साये पर विश्वास किया
साया क्या रस्ता बतलाता वो ख़ुद गूँगा-बहरा था

दीपक की लौ नागिन बनकर झूम रही थी दीवारों पर
तन्हाई में बीन से ज़्यादा सन्नाटों का लहरा था

जिसकी कश्ती टकराई थी रेत भरे तूफ़ानों से
उस बेचारे 'माँझी' का कब जिस्म भी तट पर ठहरा था
                                                -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Mai'n to usko dekh na paaya jaane kaisa chehraa tha...
Dard ka pa'nchhee jis dam aaya tab andhiyaara gehraa tha...

Maine jab muskaana chaaha aankhe'n barbas cheeKH uTHee'n...
Meri qismat par tou yaaro gardish ka hi pahraa tha...

Ye to meri KHush.fahmee thi saaye par vishwaas kiya...
Saaya kyaa rastaa batlaata vo KHud
guu'ngaa-bahraa tha...

Deepak ki lau naagin ban kar jhoom rahi deewaro'n par...
Tanhaayi me'n been se zyaada sannaato'n ka lahraa tha...

Jiski kashtii Takraaii thi ret bhare toofaano'n se...
Us bechaare "Manjhi" ka kab jism bhi taT par THahraa tha...

- Devender Manjhi


Friday, February 5, 2016

298.  राह से मुझको वही भटका गया 


राह से मुझको वही भटका गया
भूत बनकर ज़ेह्न पर जो छा गया

उसको आना ही नहीं, क्या आएगा
याद का पैकर भले ही आ गया

ज़िन्दगी का आईना हाथों में दे
किसलिए उलझन में तू उलझा गया

बिन धुआँ ही जल गया सारा मकाँ
आग सीने में कोई सुलगा गया

प्यास 'माँझी' की बुझे कैसे बता
सामने खारा समन्दर आ गया
                         -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Raah se mujh ko vahi bhaTkaa gayaa 
Bhoot ban kar zehn par jo chhaa gayaa 

Usko aana hi nahi'n, kyaa aayegaa 
Yaad ka paikar bhale hi aa gaya 

Zindagi ka aainaa haatho'n me'n de 
Kisliye uljhan me'n tuu uljhaa gayaa 

Bin dhuaa'n hi jal gayaa saara makaa'n 
Aag siine me'n koi sulgaa gayaa 

Pyaas "Manjhi" ki bujhe kaise, bataa 
Saamne khaara samandar aa gayaa 
                                     - Devender Manjhi

297. भीड़ तो अच्छी-ख़ासी थी 


भीड़ तो अच्छी-ख़ासी थी
फिर भी ख़ूब उदासी थी

शोर हुआ तो याद गई
तन्हाई की वासी थी

वक़्त की सीता हर ही ली
प्रीत मेरी संन्यासी थी

मेरे हिस्से आई जो
ख़ुशबू वो भी बासी थी

जान तड़पकर दी 'माँझी'
मछली कितनी प्यासी थी
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296. मेरी नज़र में यूँ पड़ा वो एक दिन 


मेरी नज़र में यूँ पड़ा वो एक दिन
दिल की अँगूठी में जड़ा वो एक दिन

दिल पर किसी की बात का ये था असर
बस रह गया बुत-सा खड़ा वो एक दिन

जो धूप से लड़कर बना साया सदा
थक-हारकर गिर  पड़ा वो एक दिन

दिन में सितारे दीख सबको ही गए
यूँ बात पर अपनी अड़ा  वो एक दिन

रहता है 'मांझी' चिड़चिड़ा-सा आजकल
इक मौज से ही लड़ पड़ा वो एक दिन