Sunday, January 31, 2016

295. यूँ ही मत मस्ताते रहना 


यूँ ही मत मस्ताते रहना
ख़ुद को भी समझाते रहना

अपने प्रश्नों से महफ़िल में
मानवता बरसाते रहना

दम घुटता है बेशक घर में
फिर भी आते-जाते रहना

खिड़की के रस्ते कमरे में
रौशन पैकर लाते रहना

तट की चिन्ता छोड़के 'माँझी'
अपनी नाव चलाते रहना
                      -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Yuu'n hi mat mastaate rahnaa
KHud ko bhi samjhaate rahnaa

Apne prashno'n se mahfil me'n
Maanavtaa barsaate rahnaa

Dam ghuT taa hai beshak ghar me'n
Phir bhi aate-jaate rahna

KhiDkee ke raste kamre me'n
Raushan paikar laate rahnaa

taT ki chintaa chhoRR ke "Manjhi"
Apni naav chalaate rahnaa

-Devender Manjhi

Prashno'n = Sawaalo'n

Thursday, January 21, 2016

294.  पुण्य जिनको चाहिए अड्डा जमाओ उस तरफ़ 


पुण्य जिनको चाहिए अड्डा जमाओ उस तरफ़
जाओ भी तुम शहर के सारे ख़ुदाओ उस तरफ़

हम मुख़ालिफ़ तो नहीं लेकिन हमारी शर्त है
आईना बेशक दिखाओ पर दिखाओ उस तरफ़

इस तरफ़ तो भीड़ है सुनता नहीं है शोर में
काम की बातें करें कुछ, आप आओ उस तरफ़

वो नगर सादादिली के नाम पर मशहूर है
ऐ शरीफ़ो मान जाओ, तुम न जाओ उस तरफ़

घाट पर 'माँझी' को आई नींद काफ़ी ज़ोर से
लहर तुम फ़ित्ना उठाओ तो उठाओ उस तरफ़
                                          -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. मुख़ालिफ़=विरोधी।

(मजबूरियाँ मेरी'से)

Punya jinko chahiye, aDDaa jamaao us taraf...
Jaao bhi tum shahar ke saare KHudaao us taraf 

Ham muKHaalif tou nahi'n lekin hamaari shart hai 
Aainaa beshak dikhaao par dikhaao us taraf 

Is taraf tou bheeRR hai, suntaa nahi'n hai shor mein 
Kaam ki baate'n kare'n kuchh, aap aao us taraf 

Vo nagar saadaa.dilee ke naam par mash.hoor hai 
Aie shareefo maan jaao, tum na jaao us taraf 

GhaaT par 'Manjhi' ko aaii nee'nd kaafii zor se 
Lahar tum fitnaa uTHaao tou uTHaao us taraf 
                             -Devender Manjhi 

 Punya = sawaab

Tuesday, January 19, 2016

293. वो जो कल मुस्कुराया था 


वो जो कल मुस्कुराया था
मैं नहीं था वो मेरा साया था

शाख से झाड़ ले गया पत्ते
कैसा झौंका हवा का आया था

आइनों में उदास चेहरों को
किसने फिर आईना दिखाया था

कैसे सुनता मैं उसकी तक़रीरें
अपने होंठों में बुदबुदाया था

काम क्या कर दिया बता 'माँझी'
लब पे लहरों के नाम आया था
                         -देवेन्द्र माँझी
(मजबूरियाँ मेरी' से)

Sunday, January 17, 2016

292.  पीछा इन सोचों के लश्कर से छुड़ाता कैसे 


पीछा इन सोचों के लश्कर से छुड़ाता कैसे
शहर तन्हाई में ख्वाबों का बसाता कैसे

लाख चाहा था उजालों से रहूँ दूर मगर
धूप दहलीज़ पर थी उसको भगाता कैसे

सबने पहचान लिया आज मेरे क़ातिल को
ख़ूं-रँगे हाथ थे वो शख़्स छुपाता कैसे

आज जंगल में कहीं आग भड़क उट्ठी है
गर्म पत्तों को ये झोंका यहाँ लाता कैसे

इतना कोहरा था कि साहिल भी दिखाई न दिया
'माँझी' इस नाव को दरिया में घुमाता कैसे
                                          -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Friday, January 15, 2016

291. तुम से जो भी दूरी थी 


तुम से जो भी दूरी थी
वो मेरी मजबूरी थी

मरते दम भर आईं आँखें
चाहत एक अधूरी थी

तुमने बात न मानी वो
जबकि बहुत ज़रूरी थी

जोग लिया सूरज ने तब
सन्ध्या जब सिन्दूरी थी

नाव डुबोने की 'माँझी'
साज़िश उनकी पूरी थी
                -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Tum se jo bhi doori thi 
Vo meri majboori thi 

Marte dam bhar aayee'n aankhe'n 
Chaahat eik adhoori thi 

Tum ne baat na maani vo
Jabki bahut zaroori thi 

Jog liya sooraj ne tab 
Sandhyaa jab sindoori thi 

Naav dubone ki 'Manjhi' 
Saazish unkii poorii thii 
           -Devender Majhi

Thursday, January 14, 2016

290. झील में देखकर इक कँवल आजकल 


झील में देखकर इक कँवल आजकल
आँख रहने लगी है सजल आजकल

धूप हर ले न तेरा कहीं चीर सुन
छाँव बनकर न इतना मचल आजकल

लोग पी जाएँगे मुफ़्त मय की तरह
वक़्त बदला है तू भी बदल आजकल

रंज देना ये अपनों ने छोड़ा है क्या
कोई होती नहीं है ग़ज़ल आजकल

गर पसीने में नहाया है 'माँझी' तो क्या
नाव खेना नहीं है सहल आजकल
                               -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Jheel me'n dekhkar ik ka'nwal aajkal 
Aa'nkh rahne lagi hai sajal aajkal 

Dhoop har le na tera kahi'n cheer sun 
Chhaa'NV bankar na itnaa machal aajkal 

Log pee jaae'nge muft mai ki tarah 
Waqt badlaa hai tuu bhi badal aajkal 

Ranj denaa ye apno'n ne chhoRaa hai kyaa 
Koi hoti nahi'n hai ghazal aajkal 

Gar pasiine me'n nahaayaa hai 'Manjhi' tou kyaa 
Naav khenaa nahi'n hai sahal aajkal 
                                     -Devender Manjhi 
Sajal = paani ke saath, nam 
Har lenaa = Le lenaa, churaa lenaa 
Cheer = kapRe, libaas


Wednesday, January 13, 2016

289. शीशा लेकर आये कौन 


शीशा लेकर आये कौन
सर अपना फुड़वाए कौन

जेबें खाली हैं बापू की
बच्चे को समझाए कौन

जिसका उत्तर, लटके चेहरे
ऐसा प्रश्न उठाए कौन

सिर्फ़ उजाला पाने को
घर में आग लगाए कौन

लहरों की आखें हैं लाल
'माँझी' बनकर आये कौन
                     -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Tuesday, January 12, 2016

288. सुनसान जंगलों में बुलाता मैं किस तरह 


सुनसान जंगलों में बुलाता मैं किस तरह
जब रूठ ही गए तो मनाता मैं किस तरह

यादों की रौशनी तो उसी से मिली मुझे
फूँकों से उस दीये को बुझाता मैं किस तरह

तेरी अमानतें तो हैं दिल में छुपी हुई
ज़ख्मों को आईने में दिखाता मैं किस तरह

सब क़ाफ़िलों के नक़्शे-कफ़े-पा उदास थे
मटियाले रास्तों को सजाता मैं किस तरह

'माँझी' अकेली नाव को साहिल पे छोड़कर
सोई हुई नदी को जगाता मैं किस तरह
                                    -देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. नक़्शे-कफ़े-पा=पाँवों के निशान।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Monday, January 11, 2016

287. मन को ना ज़्यादा समझायें 


मन को ना ज़्यादा समझायें
वरना उपजेंगी कुण्ठायें

मेरा जीवन क्या बदलेंगी
वेदों की दो-चार ऋचायें

सूरज की किरणों से कह दो
चिड़ियों के ना पर झुलसायें

रोज़ रिझाने आ जाती हैं
सन्नाटे की ख़ास अदायें

लोगों का दस्तूर है 'माँझी'
बात करें, उससे फिर जायें
                    -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Man ko na zyaada samjhaaye'n 
Varnaa upje'ngee kunTHaaye'n 

Mera jeevan kyaa badle'ngee 
Vedo'n kee do-chaar Richaaye'n 

Sooraj ki kirno'n se kah do 
ChiRiyo'n ke naa par jhulsaaye'n 

Roz rijhaane aa jaati hai'n 
SannaaTe ki KHaas adaaye'n 

Logo'n ka dastoor hai 'Manjhi'
Baat kare'n, us.se phir jaaye'n 
                 -Devender Manjhi


Friday, January 8, 2016

286. पल में बदलें इतने रंग 


पल में बदलें इतने रंग
देख के उनको सब हैं दंग

पूर्ण स्वयं को कहते हैं
अंग हुए हैं जिनके भंग

धूप की शै पर बढ़ते हैं
साये हैं जो मेरे संग

मुँह में उँगली वक़्त रखे
देखके मुझसे मेरी जंग

इस-उसकी क्यों बात करें
सबके अपने-अपने ढंग

'माँझी' ही जीतेगा जंग,
तूफ़ाँ करले कितना तंग
             -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)
 

Thursday, January 7, 2016

285.  चुपके-चुपके आता क्यों है 


चुपके-चुपके आता क्यों है
मुझको रोज़ रिझाता क्यों है

कट जाएगा पेड़ बना तो
अंकुर ये अकुलाता क्यों है

दीपक के नीचे अँधियारा
जाकर यूँ छुप जाता क्यों है

नव-प्रभात की ख़्वाहिश लेकर
रोज़ ये दिन ढल जाता क्यों है

खारा है फिर भी ऐ 'माँझी'
सागर मुझको भाता क्यों है
                     -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

KaT jaaegaa peD banaa to 
Ankur ye akulaataa kyo'n hai 

Deepak ke neeche a'ndhiyaaraa 
Jaakar yuu'n chhup jaataa kyo'n hai 

Nav-prabhaat ki KHwaahish lekar 
Roz ye din DHal jaataa kyo'n hai 

Khaaraa hai phir bhi aei 'Manjhi' 
Saagar mujh ko bhaataa kyo'n hai 
                        -Devender Manjhi
Chat Conversation End

Wednesday, January 6, 2016

284.  लिख रहा था ख़त मगर दिल उसका कुछ शंकित लगा 


लिख रहा था ख़त मगर दिल उसका कुछ शंकित लगा
इसलिए तो हाथ भी उसका बहुत कम्पित लगा

सिर्फ़ क़िस्मत के सहारे बैठने से कुछ नहीं
काम तब हो पाएगा तू काम में तो चित्त लगा

मुस्कुराहट फेंककर निकला है जो इस राह से
सच कहूँ उसका भी मन मुझको बहुत कलुषित लगा

 'वोल्गा से गंग तक' राहुल ने जो देखा उसे
एक निश्चित रंग में रँगना मुझे अनुचित लगा

भूलकर सब हेंकड़ी ' माँझी' से आकर मिल गया
जब समन्दर को भी इसमें सधता अपना हित लगा
                                                   -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. 'वोल्गा से गंग तक'=यात्रा-वृतान्त की एक सुप्रसिद्ध पुस्तक, 2. राहुल=इस पुस्तक के लेखक राहुल सांस्कृत्यायन।

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Likh rahaa tha khat magar dil uskaa kuchh shankit* lagaa... 
Isliye tou haath bhi uskaa bahut kampit* lagaa... 

Sirf qismat ke sahaare baiTHne se kuchh nahi'n... 
Kaam tab ho paaegaa, tuu kaam me'n tou chitt* lagaa... 

MuskuraahaT phei'nk kar niklaa hai jo is raah par... 
Sach kahuu'n uskaa bhi man mujhko bahut kalushit* lagaa... 

 "Volgaa se Gang" tak "Rahul" ne jo dekhaa use... 
Ek nishchit ra'ng me'n ra'ngnaa mujhe anuchit lagaa...  

Bhool kar sab hek.Dee 'Manjhi' se aakar mil gayaa... 
Jab samandar ko bhi isme'n sadh.taa apna hit lagaa... 
                                        -Devender Manjhi 

Volgaa se Gangaa tak = yaatraa-vritaa'nt (safar-naama) ki ek suprasiddh pustak (mash.hoor kitaab) 
Rahul = Is pustak (kitaab) ke lekhak Rahul Saa'nskrityaayan 
*Shankit = Doubtful, shak me'n mubtilaa 
*Kampit = zumbish kartaa hua, hiltaa hua 
*Chitt = man, dil 
*Kalushit = kaala, mailaa,

Tuesday, January 5, 2016

283. यूँ ही नहीं कराहों का तअस्सुर बदल गया 


यूँ ही नहीं कराहों का तअस्सुर बदल गया
वो आग थी किसी की किसी का हाथ जल गया

फिर उसके साये में है अब भी ये नगर कैसे
जो हादिसा हुआ नहीं, बिन हुए ही टल गया

बनकर चिराग़ जोश में निकला जो रात को
वो मोम तो कभी न था, कैसे पिघल गया

सच भी छुपाये बैठा है मन में अनेक झूँठ
सुनकर हमारी बात ज़माना उछल गया

'माँझी' पे तू न डाल हिकारत-भरी नज़र
गर इक बटन क़मीज़ से मेरी निकल गया
                                      -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

Yu'n hi nahi'n karaaho'n ka ta'assur badal gayaa 
Vo aag thi kisi ki kisi ka haath jal gayaa

 Phir uske saaye me'n hai ab bhi ye nagar kaise 
Jo haadisa huaa nahi'n, bin hu.e hi Tal gayaa 

 Ban kar chiraagh josh me'n niklaa jo raat ko 
Vo mom to kabhi na thaa, kaise pighal gayaa 

Sach bhi chhupaaye baiTHaa hai man me'n anek jhuuTH 
Sunkar hamaari baat zamaana uchhal gayaa 

'Manjhi' pe tuu na Daal hikaarat bhari nazar 
Gar ik baTan qameez se meri nikal gayaa 
                                 -Devender Manjhi