Tuesday, June 30, 2015

ग़ज़ल के समन्दर में माँझी के जल्वे


 ग़ज़ल के समन्दर में माँझी के जल्वे 

देवेन्द्र माँझी की ग़ज़लों के सन्दर्भ में बात की जाए और "समन्दर के दायरे" पर नज़र डाली जाए तो कहना होगा कि देवेन्द्र माँझी ने इस दिशा में विशाल तटहीन सागर में भरपूर गोते लगाए हैं। संवेदना की सीपियाँ चुनीं हैं और अनेक सीपियाँ मोतिओं की शक्ल में सामने आईं हैं। मैंने माँझी को आज से लगभग तीन दशक पहले (लगभग-1987-88 में) एक होनहार ग़ज़लकार रूप में जाना था और उनकी ग़ज़ल-संबंधी संभावनाओं को पहचाना था। 
     उल्लेख्य है कि माँझी ग़ज़ल-रचना की दिशा में निरन्तर गतिशील है और अब-तक उनके पाँच ग़ज़ल-संग्रह प्रकाश में आ चुके हैं। यों, यह कतई महत्त्वपूर्ण नहीं है. क्योंकि ग़ज़ल की दुनिया में छह-छह, सात-सात संकलन प्रकाशित कराने वाले अनेक कवि/ शायर हैं, जबकि मिर्ज़ा ग़ालिब और दुष्यंत कुमार के मात्र एक-एक संकलन ही आये और वे ग़ज़ल के आकाश पर छा गए। इसलिए, यह किंचित भी महत्त्व का विषय नहीं है कि आपके कितने संकलन प्रकाशित हुए हैं। महत्त्वपूर्ण तो यह है कि आपने जो लिखा/ कहा है वह कितना क़ाबिले-ग़ौर है और ग़ज़ल के ताज में श्रेष्ठ अश्आर के कितने नगीने जड़े गए हैं तथा कविता को किस मुकाम पर पहुँचाया गया है। 
     कहना चाहूँगा कि देवेन्द्र माँझी ने अपने स्तर पर कुछ ऐसा कर दिखाया है कि उसकी प्रतिभा और कल्पनाशीलता की भूरि-भूरि प्रशंसा की जा सकती है। ग़ज़ल में "मक़्ता" का मुकाम बड़ा अहम् है।  "मक़्ता" अर्थात ग़ज़ल के आख़िरी शे`र में अपने उपनाम का समावेश करना। देवेन्द्र ने अपने "माँझी" उपनाम को अपनी ग़ज़लों के प्रत्येक अंतिम शे`र में इतनी ख़ूबसूरती से पिरोया है कि वाह-वाह करने को मन करता है। 
       सभी जानते हैं कि ग़ज़ल के आख़िरी शे`र में मक़्ता के प्रयोग की एक समृद्ध परम्परा रही है।  मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक़ गोरखपुरी, फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़" सभी ने अपने-अपने अंदाज़ में मक़्ते का प्रयोग किया है। हिन्दी के ग़ज़लकारों में त्रिलोचन, बलबीर सिंह "रंग" और गोपालदास नीरज ने भी इस परम्परा का निर्वाह किया है। नि:संकोच कहा जा सकता है कि बलबीर सिंह रंग ने अपने समय में "रंग" उपनाम को मक़्ते में अनेक बार सार्थक शैली में पिरोया है, यथा--
  " रंग ज़माने का कुछ और ही है 
    शायरी से गुज़र कहाँ होगी?
                   या--
  "रंग का रंग ज़माने ने बहुत देखा है 
   क्या कभी आपने बलबीर से बातें की हैं"
     इसके बाद अनेक कवि/ शायरों ने मक़्ते  का प्रयोग किया मगर जो बात "रंग" के मक़्ता-प्रयोग में थी, वह दूसरों के यहाँ पूर्णत: उभरकर सामने नहीं आई। दुष्यंत ने कभी "परदेशी" उपनाम रखा था मगर ग़ज़लों तक आते-आते वे "परदेशी" नहीं रहे थे, इसलिए उपनाम-प्रयोग का सवाल ही नहीं उठा।  उसके बाद बालस्वरूप राही ने मक़्ते के कुछ सटीक प्रयोग अवश्य किए।  इस सन्दर्भ में मुझे अपने गुरु आचार्य कृष्ण कुमार कौशिक का स्मरण आ रहा है। कौशिक जी का उपनाम वैसे तो "दिनेश" था मगर गज़लें कहने के लिए उन्होंने एक और उपनाम "हृदय" अपना लिया था।  मक़्ते के प्रयोग-प्रसंग में उनकी ये पंक्तियाँ रह-रहकर याद आ रही हैं--
     "हृदय" और क्या दूँ, हृदय दे चुका हूँ 
        हृदय से गया मैं दुलारा नहीं हूँ"
     उल्लेख्य है कि कौशिक जी ने अपनी अनेकानेक ग़ज़लों में मक़्तों के रूप में "हृदय" उपनाम का ख़ूबसूरत ढंग से इस्तेमाल किया। 
      उपर्युक्त काव्य-मर्मज्ञों एवं रचनाकारों की छाया में जब मैं अपेक्षाकृतनए ग़ज़लकार देवेन्द्र माँझी के मक़्ता-प्रयोग पर नज़र डालता हूँ तो चकित रह जाता हूँ। देवेन्द्र माँझी ने अपने "माँझी" उपनाम को अपने मक़्तों में जिस ख़ूबी और कौशल से पिरोया है, वह निश्चय ही विस्मयकारी है। उन्होंने माँझी शब्द को नदी, तूफ़ान, नाव, भँवर, दरिया, समन्दर, लहर, तट, रवानी, मौजों, थपेड़ों, साहिल और पतवार जैसे अनेक शब्दों को रूपकों में ढालकर बला की ख़ूबसूरती पैदा की है। कुछ उदाहरण देखिये--
  "माँझी" को काटने दो समन्दर के दायरे 
  अब आ गयी है हाथ में पतवार चुप रहो 

इतना कोहरा था कि साहिल भी दिखाई न दिया 
"माँझी" इस नाव को दरिया में घुमाता कैसे 

मेरे सिवा इस घाट पे कोई भी तो "माँझी"
तूफ़ान से टकराने को तैयार नहीं था 

सारी दुनिया ही किनारे पे खड़ी है "माँझी"
अपनी इस छोटी-सी कश्ती में बिठाऊँ किसको 

बीच तूफाँ के कोई चीख रहा है "माँझी"
मेरी कश्ती को किनारे से लगा दे कोई 

चल कहीं "माँझी" उठा पतवार अपने हाथ में 
अब सहा जाता नहीं मौजों का साहिल पे सितम 

      ये कुछ उदाहरण हैं माँझी के मक़्ता-प्रयोग के। सचमुच ये उदाहरण माँझी की प्रतिभा, ग़ज़लगोई की सामर्थ्य और कहन के विभिन्न रंगों की गवाही देने के लिए काफ़ी है। कहना होगा कि उनसे पहले की पीढ़ी और समकालीन-पीढ़ी के अनेक ग़ज़ल-गो कवि/ शायरों ने उपनाम अर्थात तख़ल्लुस रखे मगर अपनी ग़ज़लों में उपनाम के प्रयोग को उतना सटीक अंदाज़ नहीं दे पाये जैसाकि देवेन्द्र माँझी ने कर दिखाया।
        यह सच है कि देवेन्द्र माँझी ने ग़ज़लों को रवायती अंदाज़ में कहा। उनके यहाँ रदीफ़-क़ाफ़िया बहुत अधिक नया करने की वाञ्छा भी नहीं झलकती। "अलिफ़" के क़ाफ़िया का उन्होंने भी अनेक जगह प्रयोग किया है मगर फिर भी पुराने अंदाज़ में "माँझी" का अपना अंदाज़ पिरोने में वे किसी से पीछे नहीं रहे। उन पर उर्दू शायरी का पुख़्ता असर इसलिए भी है कि उन्होंने ग़ज़ल में उर्दू की रंगत को हिन्दी मुहावरों की अपेक्षा अधिक मात्रा में ग्रहण किया है। उनके अशआर मँजे हुए कवि/ शायर की मेधा की सूचना देते हैं, यथा--

मैं तो अनजान मुसाफ़िर हूँ भटकनेवाला 
मेरी मंज़िल का पता हो तो बता दे कोई 

क़ैदे-तन्हाई में घुट-घुट के न मर जाऊँ कहीं 
उनकी महफ़िल में मेरा हाल सुना दे कोई

कहना होगा कि देवेन्द्र माँझी की ग़ज़लों में ग़ज़लियत के रंग सही ढंग से झलकते हैं और उभरते हैं।  उन्हें कोई भी गायक अपने सुरों में पिरो सकता है, कोई भी दानिशमंद उन्हें उद्धृत कर सकता है और भविष्य का कोई भी छात्र उन्हें श्रेष्ठ पंक्तिओं के रूप में याद कर सकता है। ग़ज़ल की नई पीढ़ी में माँझी का नाम और काम सम्मान का हक़दार है, ऐसी मेरी मान्यता है। "समन्दर के दायरे" के इस तृतीय-संस्करण के प्रकाशन पर माँझी को मेरी अनेकानेक हार्दिक शुभ-कामनाएँ।
                                                                                                                                         -शेरजंग गर्ग
(नोट--"समन्दर के दायरे" के तीसरे संस्करण के प्रकाशन अवसर पर सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. शेरजंग गर्ग ने जनवरी-2008 में यह भूमिका लिखी थी )

चुपचाप अंजुमन से कहाँ जा रहे हैं लोग



  89. चुपचाप अंजुमन से कहाँ जा रहे हैं लोग

                          चुपचाप अंजुमन से कहाँ जा रहे हैं लोग 
                          लगता है जैसे आन के पछता रहे हैं लोग 

                           वो कौन-सा गुनाह किया है कि सब-के-सब 
                           इक-दूसरे को देखकर शरमा रहे हैं लोग

                           ढलने लगी है रात झरोके को खोल दे 
                           ऐ जाने-इन्तिज़ार सज़ा पा रहे हैं लोग 

                          क्या बात है शबाब पर होते हुए बहार 
                           बाग़ों के दरम्यान भी मुरझा रहे हैं लोग 

                           ये किसके फूल फैंक दिए हैं नदी के बीच 
                           "माँझी" इधर-उधर से चले आ रहे हैं लोग 
                                                                  -देवेन्द्र माँझी 
मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे से, जो 1985 में प्रकाशित हुआ था

 88.    ये हवा को भी ख़बर है क्या करूँ 


                           ये हवा को भी ख़बर है क्या करूँ 
                           आग का वो हमसफ़र है क्या करूँ 

                           आँख में उसके क़हर है आजकल 
                            बेख़बर सारा नगर  है क्या करूँ 

                             लौट जाऊँ ये कभी सीखा नहीं 
                             दूर तक अन्धा सफ़र  है क्या करूँ 

                            फूल, पत्ता और साया कुछ नहीं 
                            धूप में जलता शजर  है क्या करूँ 

                             मत डरा तू इस तरह "माँझी" मुझे 
                             धुंध छाने को अगर  है क्या करूँ 
                                                           -देवेन्द्र माँझी 

Monday, June 29, 2015


 87.    कैसा मौसम है तेरे नगर का 


                            कैसा मौसम है तेरे नगर का 
                            उड़ गया रंग शाख-ओ-शजर का 

                             आप अच्छे रहे आँख मूँदे 
                             खा गया मुझको धोखा नज़र का 

                              पाँव के साथ इन्साफ़ होगा 
                             जायज़ा ले लिया गर सफ़र का 

                             ग़ैर की छत पे मेरे परिन्दे 
                             ये ही रोना रहा उम्र-भर का 

                            रोज़ आता है लेने उसे क्यों 
                            कौन लगता है "माँझी" भँवर का 
                                                           -देवेन्द्र माँझी 


 86.    चल दिया है बीज वो उल्फ़त के बोकर 


                               चल दिया है बीज वो उल्फ़त के बोकर 
                               सींच भी लो सबके सब तुम एक होकर 

                                हाँ, रखैलों की तरह सिसकी बहुत है 
                                ज़िन्दगी मेरे बदन में क़ैद होकर 

                                कल मेरे ही दम से जाना जाएगा 
                                मारता है जो ज़माना आज ठोकर 

                                क्या परेशानी है तुझको ये बता तू 
                                 साथ क्या लाया था जो जाएगा खोकर 

                               राम की गंगा हुई मैली जो "माँझी"
                                साफ़ कर लहरों का दामन आज धोकर 
                                                                    -देवेन्द्र माँझी 
                                  

Sunday, June 28, 2015


 85.    यूँ ही न बैठ, उठ खड़ा हो, चल तलाश कर


                             यूँ ही न बैठ, उठ खड़ा हो, चल तलाश कर 
                              दुनिया की आँख में ज़रा तू जल तलाश कर

                               रह भी न पाएँगे यहाँ दो एक साथ में 
                               मुझ-सा न कोई दूसरा पागल तलाश कर 

                              तुझसे न खेला जाएगा ये खेल इश्क़ का 
                              बच्चा है जाके माँ का तू आँचल तलाश कर 

                              गिर जाएगा जो आ गयीं अब तेज़ आँधियाँ 
                              बूढ़े शजर के वास्ते सम्बल तलाश कर 

                             "माँझी" तू फिर से थाम ले पतवार हाथ में 
                             सोये हुए सागर में तू हलचल तलाश कर 
                                                                    -देवेन्द्र माँझी 
                                                                  

Friday, June 26, 2015



 84.    हाँ, ख़ुशी मिल जाएगी हमको इसी परिणाम से


                              हाँ, ख़ुशी मिल जाएगी हमको इसी परिणाम से 
                              जान लें ये लोग बस हमको हमारे नाम से 

                               कौन कैसा है, करे क्या, क्या करेंगे जानकर
                               गुठलियाँ हम क्यों गिनें, मतलब हमें है आम से 

                              सच बताऊँ काम आते हैं वही तो आजकल 
                              इस नगर में वो जो चहरे हैं बहुत बदनाम से 

                             भावनाओं की नहीं क़ीमत यहाँ कुछ, जान लो 
                             काम चलता है यहाँ पर अंटिओं के दाम से 

                             रात का आलम नहीं देखा है उसने आज-तक 
                             डूब-सा जाता है "माँझी" किस नदी में शाम से 
                                                                           -देवेन्द्र माँझी

 83.    जीवन के सरगम को ख़ास तराने दो


                            जीवन के सरगम को ख़ास तराने दो 
                            गीत मुझे भी अपने मन का गाने दो 

                            अपनेपन की शीतल छाया दो मुझको 
                            थककर चूर हुआ हूँ अब सुस्ताने दो 

                            सूरज सर पर आया, पलकें खुल जाओ 
                            ख़्वाबों के झुरमुट को अब अलसाने दो 

                            क़त्ल करूँ क़ातिल आदर्शों का मैं भी 
                            मेरे हाथों में भी तुम दस्ताने दो 

                            दूर हटो तूफ़ानी लहरो "माँझी" को 
                            आज किनारे अपनी कश्ती लाने दो 
                                                       -देवेन्द्र माँझी
                                                      09810793186 
                              

Thursday, June 25, 2015


 82.    भावनाओं का दमन कर लें ज़रा

                 भावनाओं का दमन कर लें ज़रा 
                     आपको भी हम नमन कर लें ज़रा 

                    हम वसूलेंगे फिरौती मौत से 
                    ज़िन्दगी का अपहरण कर लें ज़रा 

                    साफ़ ये वातावरण क्यों है नहीं 
                    आओ ! हम चिंतन-मनन कर लें ज़रा 

                    तितलिओं के पर नहीं छिद पाएँगे 
                    कंटकों को हम सुमन कर लें ज़रा 

                    फिर खुले आकाश को देंगे सदा 
                    आँख-भर अपना गगन कर लें ज़रा 

                     नाव भी "माँझी" तटों पर लाएँगे 
                     हम भँवर का आचमन कर लें ज़रा 
                                                     -देवेन्द्र माँझी

 81.    हमसफ़र ये तो बता तुझको कभी


                           हमसफ़र ये तो बता तुझको कभी 
                           रास्तों ने दी सदा तुझको कभी 

                          धूप का सारा बदन खोया कहाँ 
                         कुछ पता इसका चला तुझको कभी
                         
                        ये सियासी-पेड़ दे ना पाएगा
                        फूल, फल, ताज़ी हवा तुझको कभी 

                        टाल दी थीं बात तूने ही सभी 
                        क्या नहीं मैंने कहा तुझको कभी 
                        
                       दूर दरिया से है "माँझी" किसलिए 
                       क्या लगा इसका पता तुझको कभी 
                                                          -देवेन्द्र माँझी

 80.    चुप्पी की जब साज़िश समझा अपने मन की हलचल को


                               चुप्पी की जब साज़िश समझा अपने मन की हलचल को 
                               खोल दिया तब झटपट मैंने निज होंठों की साँकल को 

                               मेरे वध के आदेशों पर ख़ुशियाँ लोग मनाते हैं 
                               क़ातिल ने क्या सजा लिया है देखो अपने मक़तल को 

                                लानत है उन बेटों पर जो बेशर्मी से देख रहे 
                                साज़िश के पंजों में फटता अपनी माँ के आँचल को 

                               पीपल को क्या भाग्य मिला है पुजता तो है रोज़ मगर 
                               दूर सभी रखते हैं फिर भी अपने घर से पीपल को 

                               "माँझी" को तुम मत छेड़ो एकाग्र हुआ बैठा है वो
                               बाँध रहा है आज क़लम से आते-जाते हर पल को 
                                                                                   -देवेन्द्र माँझी

                              

 79    कैसा कमाल शोर न आहट ज़रा भी है


                      कैसा कमाल शोर न आहट ज़रा भी है 
                      हालांकि हादिसों से ये मंज़र भरा भी है 

                      पतझड़ की साज़िशों से तो जूझा है ये चमन 
                      इसका सबूत है कि इक हिस्सा हरा भी है 

                     नाकामियों ने कर दिया उस शख़्स को उदास 
                     दुनिया की बात क्या है वो ख़ुदसे डरा भी है 

                     मुझसे ज़रा जफ़ा का नया खेल खेलकर 
                     मुझको बताओ प्यार में कोई मरा भी है 

                      चलने से पहले देख लो किस मूड में है वो 
                      संजीदा "माँझी" है अगर तो मसखरा भी है 
                                                             -देवेन्द्र माँझी

Wednesday, June 24, 2015



आज के दिन आया जीवन में बदलाव
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हाँ दोस्तों, आज 25 जून है. चालीस साल पहले आज के दिन इस देश में इमरजेंसी लगी थी. पूरे देश को कारागार में तब्दील कर दिया गया था। उस समय मेरी आयु 18 वर्ष थी. किशोरावस्था को छोड़कर मैं जवानी की देहलीज़ पर क़दम रख रहा था लेकिन इमरजेंसी के काले साये को तरुणाई की मेरी मस्ती रास नहीं आई। युवा था, तो उस समय देश में चल रही राजनीतिक और सामाजिक गतिविधिओं की तरफ़ भी मेरा रुझान बढ़ रहा था।  बस यही बात स्थानीय प्रशासन को खल गयी।  नतीजतन, एक थानेदार दो सिपाहिओं को लेकर मेरे यहाँ आ धमका. उस समय मैं अपने पिताजी (श्री गोपी चन्द गोयल ) के साथ उनकी अनाज की आढ़त पर बैठा हुआ था।  आते ही थानेदार ने झूठ बोला "देवेन्द्र, तुम्हारे कुछ साथिओं में झगड़ा हो गया है, वे थाने में बैठे हैं, तुम चलकर उनका फैसला करा दो. मुझे थानेदार की बात पर विश्वास नहीं आया।  मेरा दिल कुछ और ही गवाही दे रहा था। फिर भी, थानेदार की बात मानकर थाने तो जाना ही था। मैं उनके साथ थाने पहुँचा तो सच्चाई सामने आई. मगर उससे बचने का कोई रास्ता नहीं था। दर-अस्ल उन दिनों लोकनायक जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन ज़ोरों पर था।  मैं भी उससे हमदर्दी रखता था।  उसी से नाराज प्रशासन ने मुझे गिरफ़्तार करने का फैसला ले लिया। मुझे डीआईआर (डिफेन्स इंडियन रूल्स )-33 के अंतर्गत गिरिफ़्तार करके मुझपर आरोप लगाया गया की मैं सशस्त्र जुलूस निकाल रहा था तथा थाने और तहसील को फूंकने जा रहा था , यह दूसरी बात है कि तथाकथित सशस्त्र जुलूस निकालने वाले को तो पुलिस ने गिरिफ़्तार कर लिया मगर उसके शस्त्र पुलिस के हाथ कभी नहीं लग पाये। ख़ैर, मुझे नूँह (मेवात ज़िला मुख्यालय, हरियाणा) से गिरिफ़्तार करके, क़ानूनी नाटकों से गुजारकर गुड़गांव के ज़िला कारागार में भेज दिया। यहाँ मुझे बैरेक नंबर 4 में रखा गया।  मेरे साथ पलवल से मूलचंद मंगला और फरीदाबाद के दीपचंद भाटिया भी उसी बैरेक में बंद थे, जो बाद में 1977 के चुनावों में क्रमश पलवल और फरीदाबाद से विधायक चुने गए। ख़ैर, उनकी कहानी उनके साथ, मैं जेल के अंदर यही सोचता रहता था कि किस तरह झूठे आरोप लगाकर पुलिस किसी को गिरिफ़्तार कर लेती है।  ज्यों-ज्यों मैं सोचता, मेरा खून और अधिक उबाल मारने लगता। हाँ, एक बात ज़रूर अच्छी हुई। वो यह कि मुझे साहित्य और विशेषरूप से ग़ज़ल के बारे में यहाँ के एकान्त जीवन में सोचने-विचारने और समझने का भरपूर अवसर मिला। यहीं से मेरी ग़ज़लों ने उड़ान भरनी शुरू की. यहीं से एक व्यापारी का बेटा एक ग़ज़लकार के रूप में अपनी सोचों को विस्तार देने में जुट गया था।  आज न नूँह का वह थाना है और न गुड़गांव का वह जिला कारागार, दोनों को तोड़कर नई जगह बना दिया गया है, मगर मेरे मन की टीस ज्यों की त्यों बाक़ी है।
-देवेन्द्र माँझी, 25 जून, 2015

 78.   जिसने ख़्वाबों-सा कभी आँख में पाला मुझको 


                              जिसने ख़्वाबों-सा कभी आँख में पाला मुझको 
                              आज तिनके की तरह उसने निकाला मुझको 

                               दोस्तों की तो कभी सफ़ में नहीं देखा था 
                               कौन था जिसने सरे-शाम सम्हाला मुझको 

                                अपने भक्तों से भी उकता-सा गया लगता है 
                                रोज़ आवाज़-सी देता है शिवाला मुझको 

                               आ गया गर तू ज़मीं पर तो नहीं लौटेगा 
                               अपनी ज़न्नत का न दे और हवाला मुझको 

                               देखता यूँ ही रहा खोटो-खरापन मेरा 
                               मौज-दर-मौज समन्दर ने उछाला मुझको 

                               मैं नदी ऐसी कि पानी ही नहीं है मुझमें 
                               फिर भी "मांझी" ने कई रोज़ खंगाला मुझको 
                                                                          -देवेन्द्र माँझी 

 77.    ज़माने की ख़बर के साथ अपनी भी ख़बर रखता 

                                 ज़माने की ख़बर के साथ अपनी भी ख़बर रखता 
                                 ज़रा मुश्किल तो रहता ये मगर ख़ुद पर नज़र रखता 

                                 बुढ़ापा काम में मशगूल है तो कुछ सबब होगा 
                                  मैं अपने पेट पर पट्टी भी कब तक बाँधकर रखता 

                                   वो अपने आपको अक्सर मुकम्मल ही बताता है
                                    किसी के आस्ताने फिर वो कैसे अपना सर रखता 

                                   वो बच्चा जो खिलौनों से कभी खेला नहीं, कैसे 
                                   किसी गुड्डे के गठजोड़े से गुड़िया बाँधकर रखता 

                                   फ़क़ीरी का कभी चोला पहनकर मैं निकलता क्या 
                                   अगर अपना बनाकर मुझको ये सारा जहाँ रखता 

                                  बलाओं की सदाओं से मुझे डर "माँझी" लगता है 
                                  अजूबा ज़िन्दगी का किस तरह मैं नाव पर रखता 
                                                                                      -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ-1. मशगूल=व्यस्त, 2. मुकम्मल=सम्पूर्ण, 3. आस्ताने=ऋषि का आश्रम या वली की ख़ानक़ाह , चौखट, दहलीज़, 4. बलाओं=विपत्तिओं, आफ़तों, 5. सदाओं=आवाज़ों, 6. अजूबा=अनोखी चीज़। 

 76.   लोग कहते हैं, काम आते हैं 


              
                       लोग कहते हैं, काम आते हैं 
                       जिनके महफ़िल में नाम आते हैं 

                       रूठ जाती है रौशनी जब भी 
                       ताक के दीप काम आते हैं 

                       कर के देखो ज़मीर का सौदा 
                       किस कदर खुल के दाम आते हैं 

                       एक मुद्दत हुई जिन्हें बिछुड़े 
                       याद क्यों सुब्हो-शाम आते हैं 

                       तू भँवर से ख़फ़ा न हो "माँझी"
                       इस तरह के मुकाम होते हैं 
                                                 -देवेन्द्र माँझी 

Tuesday, June 23, 2015


 75.   किया हाल सूरज ने क्या रात का


                      किया हाल सूरज ने क्या रात का 
                      निशाँ तक न बाक़ी बचा रात का 

                      नगर की ख़मोशी भी छंट जाएगी 
                      पढ़ा है अभी मर्सिया रात का 

                     बुढ़ापा क्यों सूरज को आने लगा 
                      जला है जो फिर से दीया रात का 

                       चलो बज़्म रंगीन हम भी करें 
                      सुनाई दिया कहकहा रात का 

                       कहाँ होश "माँझी" को उस वक़्त था 
                       भुला दो सुना और कहा रात का 
                                                -देवेन्द्र माँझी

 74.    होंठ बेशक बन्द हैं बेशक ज़बाँ है चुप


                           होंठ बेशक बन्द हैं, बेशक ज़बाँ है चुप 
                           बोलती हैं आँख जिसकी वो कहाँ है चुप

                          सोचकर शायद यही सारा जहाँ है चुप 
                          वो सुख़नवर है बड़ा जिसकी ज़बाँ है चुप 

                           उसके दोनों पहलुओं का ये नज़ारा है 
                           तीर खेले खेल अपना और कमाँ  है चुप 

                          मालिकों का यूँ नमक वो याद रखता है 
                          बढ़ रही दीवार रोज़ाना मकाँ है चुप 

                           मौज यूँ साहिल पे "माँझी" सर पटकती है 
                           चाँद उसमें नहा रहा है आसमाँ है चुप 
                                                            -देवेन्द्र माँझी

                         

Monday, June 22, 2015

इससे पहले कि जुदाई का मुझे तू डर दे


 72.   इससे  पहले कि जुदाई का मुझे तू डर दे 


                      इससे  पहले कि जुदाई का मुझे तू डर दे 
                      एक एहसान ये कर, मुझको ही पागल कर दे 

                     आन बैठें न कबूतर ही मुहब्बत के कहीं 
                      इन मुँडेरों को अभी काँच से पूरी भर दे 

                     तेज़-रफ़्तार हवाओं ने कहा पतझड़ से 
                     आज हर पेड़  गुलशन में तू नंगा कर दे 

                     जब ये भगवान बने बैठे हैं गूंगे-बहरे 
                     इनको अहसास  का दमदार-सा इक नश्तर दे 

                    आज हालत तुझे जिस  मोड़ पर लाये "माँझी"
                    मोम की नाव बना, आग का दरिया कर दे 
                                                                -देवेन्द्र माँझी
 



 73.    आज तस्वीर कोई भी बनाये, आये 

 

                          आज तस्वीर कोई भी बनाये, आये 
                          अपने हाथों का हुनर हमको दिखाए, आये 

                          ताक में उनकी जला लेता हूँ लो मैं भी अब 
                          तुम ये आँधी से कहो दीप बुझाए, आये 

                           इस अमावस में यही एक कमी खलती है 
                           है अगर चाँद-बदन रात सजाये, आये 

                            हम गए वक़्त के पत्थर हैं पड़े राहों में 
                            किससे उम्मीद हमें, कौन उठाये, आये 

                            चिपचिपा फिर न बदन उसका रहेगा "माँझी"
                            मुझसे बेक़ैफ समन्दर में नहाये, आये 
                                                                     -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ-1. ताक में=प्रतीक्षा में, 2.  अमावस= अमावस की रात, काली रात, 3. चाँद-बदन=चाँद-जैसा बदन, प्रेयसी 4. बेक़ैफ=आनद-रहित। 
    

 71.    गाँव भुलाना भी मुश्किल है


                       गाँव भुलाना भी मुश्किल है 
                       लौटके जाना भी मुश्किल है

                       मुश्किल है गर दर्द छुपाना 
                       ज़ख़्म दिखाना भी मुश्किल है 

                       काँटे पहरेदार बने हैं 
                       फूल चुराना भी मुश्किल है 

                       किसने ये हालत बनाये 
                       आना-जाना भी मुश्किल है 

                       नाव चले ना "माँझी" बेशक 
                       छोड़ के जाना भी मुश्किल है 
                                            -देवेन्द्र माँझी

 70.    मेरा दिल ज़ुल्मे-शाही से बग़ावत ही नहीं करता


                            मेरा दिल ज़ुल्मे-शाही से बग़ावत ही नहीं करता 
                            अगर मैं आग को छूने की ज़ुर्रत ही नहीं करता 

                           जो मुस्काते हैं भक्तों की करुण आवाज़ सुनकर भी 
                           मैं ऐसे देवताओं की इबादत ही नहीं करता 

                           मेरी क़िस्मत के सब पन्ने अभी-तक अनलिखे ही हैं 
                           वो क़ातिब क्यों बना जब वो क़िताबत ही नहीं करता 

                          डराते मौत के क़िस्सों से उसको हम भला कैसे 
                          वो ऐसा शख़्स है ख़ुदसे मुहब्बत ही नहीं करता 

                          बला की चीज़ है "माँझी" बचा लेता है कश्ती को 
                          कभी दरिया-ओ-लहरों की शिकायत ही नहीं करता 
                                                                                -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. ज़ुर्रत=साहस, 2.  क़ातिब=लिखनेवाला, लेखक , 3. क़िताबत=लिखने का कार्य।

Saturday, June 20, 2015


 69.    जहाँ थक जाती है दुनिया ये जाकर


                         जहाँ थक जाती है दुनिया ये जाकर 
                         वहाँ किरदार तू अपना अदा कर 

                         अँधेरों से बचाले आज सबको 
                         उजाला कर तू अपना घर जलाकर

                         मैं घुट जाऊँगा अपनी क़ैद में ही
                          कहीं ले जा मुझे मुझसे छुड़ाकर 

                         फ़क़ीरी के लिए रहता है पागल 
                         ज़रा तू देख तो ले घर बसाकर 

                         सभी बेबस हुए बैठे हैं "मांझी"
                         इन्हें तू पार कर चप्पू चलाकर 
                                                  -देवेन्द्र माँझी

 68.    गुलाबों की महक वाला वो मंज़र छोड़ दूँ कैसे


                            गुलाबों की महक वाला वो मंज़र छोड़ दूँ कैसे
                            कि दिल की इस ज़मीं को मैं यूँ बंजर छोड़ दूँ कैसे

                            अभी तो चाँद-तारे भी चमक देते हैं बढ़-चढ़कर
                            अभी फिर ख़्वाब से महका मैं बिस्तर छोड़ दूँ कैसे

                            मेरे ख़्वाबों की वो ताबीर है जो मुझसे रूठी है
                            भिखारिन की तरह उसको मैं दर-दर छोड़ दूँ कैसे

                           अमानत में ख़यानत से कहाँ डरता है अब कोई
                           पड़ौसी के भरोसे मैं खुला घर छोड़ दूँ कैसे

                           नहीं "माँझी" अगर सीखा हुनर नल-नील का अब तक
                           किसी के नाम का पानी पे पत्थर छोड़ दूँ कैसे
                                                                        -देवेन्द्र माँझी

Friday, June 19, 2015


 67.    जो हक़ीक़त है उसे कल्पित कहानी मत करो


                              जो हक़ीक़त है उसे कल्पित कहानी मत करो 
                               वक़्त झुँझला जाएगा तुम छेड़खानी मत करो

                               फिर तमाशा इक नया हो जाएगा इस शहर में 
                               होंठ में रहने दो बातें, तुम ज़बानी मत करो 

                               कर दिया उसने अगर कुछ भूलवश, छोड़ो उसे 
                               अब दिखाकर उसको शीशा पानी-पानी मत करो 

                               तुम मुझे जीने भी दो अपनी तरह से दोस्तो 
                               मुझपे तुम इस्लाह की ये मेहरबानी मत करो 

                              फेंक दो "माँझी" तुम्हीं दर्पण को नदिया  में कहीं 
                             मुझको ही इस दौर में तुम मेरा सानी मत करो 
                                                                            -देवेन्द्र माँझी

 66.    हमने मानी बात ये, उससे जुदा कुछ भी नहीं


                            हमने मानी बात ये, उससे जुदा कुछ भी नहीं 
                            हम न पूजें गर उसे फिर देवता कुछ भी नहीं 

                            आओगे तो पाओगे उजड़ा मकाँ, बिखरी किताब 
                            मेरी दौलत है यही, इसके सिवा कुछ भी नहीं 

                            मैं लगा दीवार से गुमसुम बना बैठा हूँ यूँ 
                            गर न देखे कोई चेहरा आईना कुछ भी नहीं

                           छू गयी बिजली की जैसे तार नंगी सी मुझे 
                            याद है उसने छुआ जब, फिर पता कुछ भी नहीं 

                           इसलिए कतराके इस दरिया से "माँझी" चल दिया 
                            कौन उसको पूछता जिसकी हवा कुछ भी नहीं 
                                                                       -देवेन्द्र माँझी


 65.    इसलिए सम्बन्ध तुमसे रास कब आया मुझे


                            इसलिए सम्बन्ध तुमसे रास कब आया मुझे 
                            मैंने क्या समझा था तुमको, तुमने क्या जाना मुझे 

                           दूसरों की बात पर ही हम यक़ीं करते रहे 
                           मैंने कब जाँचा था तुमको, तुमने कब परखा मुझे 

                           दोस्ती और प्यार का ही मैं सदा क़ायल रहा 
                            और दुनिया में नहीं कुछ भी लगा अच्छा मुझे 

                          मैं तो इक बिन्दू था फिर यूँ जाने आख़िर किसलिए 
                          बिन्दुओं के बीच की रेखा गया समझा मुझे 

                         साफ़ "माँझी" दीखता है उसके मन में खोट है 
                         जिस नज़र से देखता है आजकल दरिया मुझे 
                                                                       -देवेन्द्र माँझी

Thursday, June 18, 2015


 64.    तन्हाई के कमरे में जो आज सजाकर रक्खी है


                              तन्हाई के कमरे में जो आज सजाकर रक्खी है 
                              दिखलाओ तस्वीर तुम्हारे कैसे पागलपन की है 

                              कल-तक जो ऊँची उड़ती थी पंख सुनहरे-से लेकर 
                              आज वही ख़्वाबों की चिड़िया बैठ अकेले सिसकी है 

                             रामायण और गीता के उपदेशों में उलझा है वो 
                             कर्म करे या क़िस्मत देखे ये भी एक पहेली है 

                             राह नई के चक्कर में गुम हो जाने का ख़तरा है 
                             तू भी वो ही राह पकड़ ले दुनिया जिस पर चलती है 

                              तूफ़ानों में दम कितना है "माँझी" को जो उलझा लें 
                              आज लहर की साज़िश से ही नाव हमारी अटकी है 
                                                                                   देवेन्द्र माँझी

 63.    होंठों की प्यास का यहाँ चर्चा भी मैं रहूँ 

 

                          होंठों की प्यास का यहाँ चर्चा भी मैं रहूँ 
                          पानी भी भरके लाऊँ मैं, प्यासा भी मैं रहूँ

                          दुनिया की सारी लानतें मुझपर ही वार कर 
                          वो चाहते हैं हर तरह अच्छा भी मैं रहूँ 

                           कटने की बारी आये तो मेरा ही सर कटे 
                           जब धूप साज़िशें रचे, साया भी मैं रहूँ 

                          अपनी सभी अलामतें फैंके जो मेरे द्वार 
                           उपदेश दे रहे हैं वो अपना भी मैं रहूँ 

                           मुमकिन नहीं है "माँझी" ये ऐसा जो हो सके 
                           सहरा  भी मैं रहूँ यहाँ दरिया भी मैं रहूँ 
                                                                 -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ-1. लानतें=फटकार, धिक्कार, 2. वार कर=न्योछावर करके, 3. अलामतें=चिह्न, निशान, पहचान, 4.   सहरा=रेगिस्तान, मरुस्थल। 



 62.    मेरा ही नाम था ज़ुबाँ पर यूँ चढ़ा हुआ

  

                          मेरा ही नाम था ज़ुबाँ पर यूँ चढ़ा हुआ 
                          जैसे मैं इक सबक़ रहा सबका पढ़ा हुआ 

                         ख़ुद को पुकारता रहा मैं जाने किसलिए 
                         इन आईनों के बीच में तन्हा खड़ा हुआ 

                         पत्ते तमाम आँधियों के साथ चल दिए 
                         मैं पेड़ था जो रह ही गया था पड़ा हुआ 

                          होगी ज़रूर बात कोई शर्तिया जनाब 
                          मुझपर ही हँस रहा था ज़माना खड़ा हुआ 

                          उसका नशा उतारने "माँझी" चला था यूँ 
                          क्या-क्या न कह रहा था वो दरिया चढ़ा हुआ 
                                                                      -देवेन्द्र माँझी

 61.    क्यों रुका है क़ाफ़िला, क्या बात है


                           क्यों रुका है क़ाफ़िला, क्या बात है 
                           क्या हुआ, कर ले पता, क्या बात है 

                           चाल टेढ़ी चल रही है ये हवा 
                           किसका पूछे है पता, क्या बात है 

                          इक सदा रोने की आई है अभी 
                          देख लूँ पर्दा उठा, क्या बात है 

                         रौशनी को छोड़कर वो किसलिए 
                         तीरगी पर है फ़िदा, क्या बात है 

                         नास्तिक भी ख़ौफ़ तेरा मानते 
                         मानता हूँ या ख़ुदा, क्या बात है 

                         देखकर "माँझी" के करतब नाव से 
                         आ गया मुझको मज़ा, क्या बात है 
                                                         -देवेन्द्र माँझी 
शब्दार्थ-1. तीरगी=अँधेरा। 

 60.    शरारत आँधियों की वो कभी बिजली की पाती है


                                शरारत आँधियों की वो कभी बिजली की पाती है 
                                जो चिड़िया चोंच में रोज़ाना तिनके लेके आती है 

                                  इलाही ख़ैर करना इक क़यामत हो रही बरपा
                                  किसी की रूह मेरी रूह में आकर समाती है 

                                  गली के मोड़ पर रहती है वो जो बावली बुढ़िया 
                                   मुझे ही देखकर क्यों ज़ोर से ठहाके लगाती है 

                                   कँटीली झाड़ियों पर जो पड़ी है, रामनामी है 
                                  ये चादर इस नए युग में भला किसको सुहाती है 

                                  तू "माँझी" नाव अपनी लेके चल उस पर दरिया के 
                                  ये दुनिया तो नए फ़ितने यहाँ अक्सर उठाती है 
                                                                                    -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ-1. क़यामत=प्रलय, 2. बरप=उपस्थित, खड़ी, 3. रूह=आत्मा, 4. बावली=पागल, 5. फ़ितने=उपद्रव, फ़साद। 



 59.    देखकर मुझको अगर मातम-सा छाया है यहाँ


                             देखकर मुझको अगर मातम-सा छाया है यहाँ 
                            किसलिए फिर आपने मुझको बुलाया है यहाँ 

                           मैं मुहब्बत की कसौटी का खरा कुन्दन हुआ 
                           आपने उस आग में मुझको तपाया है यहाँ 

                            कोई भी रक़्क़ास ऐसे दौर से गुज़रे नहीं 
                            ज़िन्दगी ने क़दर मुझको नचाया है यहाँ 

                           मैं अगर सूरज नहीं बनता तो क्या करता यहाँ 
                           धुंध-सा सबके ज़ेहन पर जबकि छाया है यहाँ 

                            हाथ खाली हैं मगर माथे पे "माँझी" बल भी हैं 
                            क्या पता क्या सोचकर तूफ़ान आया है यहाँ 
                                                                        -देवेन्द्र माँझी

 58.   यक्ष-प्रश्नों के अगर उत्तर लिखूँगा


     

                       यक्ष-प्रश्नों के अगर उत्तर लिखूँगा 
                       ज़िन्दगी को मैं सदा चक्कर लिखूँगा

                       जो ज़रा से ताप से पिघले हमेशा 
                       आबरू को मोम का इक घर लिखूँगा 

                       प्रेम की लिखना इबारत गर ख़ता है 
                       मैं  लिखूँगा और ये दर-दर  लिखूँगा 

                      जो हलाहल को पचा ले कंठ में ही 
                      मैं उसे भगवान शिवशंकर लिखूँगा 

                      गर चुनौती दी नहीं तूफ़ान को अब 
                      नाम "माँझी" का यहाँ कायर लिखूँगा 
                                                       -देवेन्द्र माँझी

 57.    इसका निर्णय भी तू ख़ुद ही कर ज़िन्दगी


                              इसका निर्णय भी तू ख़ुद ही कर ज़िन्दगी 
                              कौन-सा तुझमें भर दूँ कलर ज़िन्दगी

                             है जुझारू तू ख़ुद में अगर ज़िन्दगी
                             चाहती मुझसे क्यों है मफ़र ज़िन्दगी

                             जितना जो भी बढ़े, उतना वो ही घटे 
                              राम जाने है कैसा सफ़र ज़िन्दगी

                              जी रहे हैं तुझे फिर भी भयभीत हैं 
                               तुझसे लगता है क्यों सबको डर ज़िन्दगी

                               डूब जाता है "माँझी" इसी में यूँही 
                               ख़ूबसूरत-सा है इक भँवर ज़िन्दगी
                                                              -देवेन्द्र माँझी 
शब्दार्थ-1. मफ़र=दूर भागना, पलायन करना।

Tuesday, June 16, 2015


 56.    वो भी क्या कुछ ज़िन्दा है


        

                     वो भी क्या कुछ ज़िन्दा है 
                     ख़ुद से जो शर्मिन्दा है 

                     पीपल नीचे छाँव नहीं 
                     ये कहना पर-निन्दा है 

                     नीड़ बनी है देह मेरी 
                     जीवन एक परिन्दा है 

                    जान सकी ना बस्ती ये 
                    कैसा ये बाशिन्दा है 

                     छेड़े वो लहरों के तार 
                     "माँझी" क्या साज़िन्दा है 
                                       -देवेन्द्र माँझी