62. मेरा ही नाम था ज़ुबाँ पर यूँ चढ़ा हुआ
मेरा ही नाम था ज़ुबाँ पर यूँ चढ़ा हुआ
जैसे मैं इक सबक़ रहा सबका पढ़ा हुआ
ख़ुद को पुकारता रहा मैं जाने किसलिए
इन आईनों के बीच में तन्हा खड़ा हुआ
पत्ते तमाम आँधियों के साथ चल दिए
मैं पेड़ था जो रह ही गया था पड़ा हुआ
होगी ज़रूर बात कोई शर्तिया जनाब
मुझपर ही हँस रहा था ज़माना खड़ा हुआ
उसका नशा उतारने "माँझी" चला था यूँ
क्या-क्या न कह रहा था वो दरिया चढ़ा हुआ
-देवेन्द्र माँझी
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