52. ज़िन्दगी जब पेश ऐसे आएगी
ज़िन्दगी जब पेश ऐसे आएगी
इस बदन को रास कैसे आएगी
मौत पाती है विजय हर बार ही
आएगी, चाहे वो जैसे आएगी
रुक नहीं सकती ज़माने की हवा
ऐसे-वैसे, जैसे-तैसे आएगी
ये पुलिस भी इक भिखारिन की तरह
ठेलियों से लेने पैसे आएगी
दूर तक कोई नहीं तूफ़ान है
नाव "माँझी" कैसे तट पर आएगी
-देवेन्द्र माँझी
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