26. जब भी मैंने दिल पाले यारो लेता अरमान नए
जब भी मैंने दिल पाले यारो कुछ अरमान नए
ज़ख़्म न जाने क्यों आ बैठे बनकर तब मेहमान नए
इक्का-दुक्का होते गर ये, मैं भी अर्चन कर लेता
फूल कहाँ से इतने लाऊँ घर-घर हैं भगवान नए
ख़त्म कहाँ होती है दिल की जिक-जिक जीते-जी आख़िर
लेकर आओ चुप्पी के तुम कितने भी सौपान नए
रोज़ नए चेहरों से अपनी मैं पहचान बनाता हूँ
फिर भी मिल जाते हैं मुझको क्यों चेहरे अनजान नए
छोड़ो भी बेकार के क़िस्से हम "माँझी" से वाक़िफ़ हैं
बैठा कहीं उठाता होगा ख़्वाबों के तूफ़ान नए
देवेन्द्र माँझी
09810793186
No comments:
Post a Comment