41. खुल न पाया आज तक ये राज़ क्यों
खुल न पाया आज तक ये राज़ क्यों
बिन परों के है यहाँ परवाज़ क्यों
इस नगर में और भी तो लोग हैं
माँगते हो तुम मुझे ही आज क्यों
अज़नबी हूँ जब यहाँ सबके लिए
दे रहे हैं लोग फिर आवाज़ क्यों
जब किसी धुन पर थिरकना है मना
थामकर बैठे हो तुम ये साज़ क्यों
सोचता है बात बस "माँझी" यही
फिर ग़लत साबित हुआ अन्दाज़ क्यों
-देवेन्द्र मॉँझी
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