77. ज़माने की ख़बर के साथ अपनी भी ख़बर रखता
ज़माने की ख़बर के साथ अपनी भी ख़बर रखता
ज़रा मुश्किल तो रहता ये मगर ख़ुद पर नज़र रखता
बुढ़ापा काम में मशगूल है तो कुछ सबब होगा
मैं अपने पेट पर पट्टी भी कब तक बाँधकर रखता
वो अपने आपको अक्सर मुकम्मल ही बताता है
किसी के आस्ताने फिर वो कैसे अपना सर रखता
वो बच्चा जो खिलौनों से कभी खेला नहीं, कैसे
किसी गुड्डे के गठजोड़े से गुड़िया बाँधकर रखता
फ़क़ीरी का कभी चोला पहनकर मैं निकलता क्या
अगर अपना बनाकर मुझको ये सारा जहाँ रखता
बलाओं की सदाओं से मुझे डर "माँझी" लगता है
अजूबा ज़िन्दगी का किस तरह मैं नाव पर रखता
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. मशगूल=व्यस्त, 2. मुकम्मल=सम्पूर्ण, 3. आस्ताने=ऋषि का आश्रम या वली की ख़ानक़ाह , चौखट, दहलीज़, 4. बलाओं=विपत्तिओं, आफ़तों, 5. सदाओं=आवाज़ों, 6. अजूबा=अनोखी चीज़।
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