36. जब हक़ीक़त की कहानी इस ज़बाँ पर आएँगी
जब हक़ीक़त की कहानी इस ज़बाँ पर आएँगी
शहर की कुछ हस्तियाँ जाकर कहीं छिप जाएँगी
जब सियासी संधियाँ अपराध से हो जाएँगी
साथ अपने ज़ुल्मो-साज़िश क्या नहीं वो लाएँगी
देखकर घनघोर बादल मत मचल मन के मयूर
बदलियाँ हैं आग की ये आग ही बरसाएंगी
सूर्य-पूजा कर रहे हो, याद इतना भी रहे
जब तपेगी रेत तो फिर आँधियाँ भी आएँगी
मौज "माँझी" जब विदेशी क़र्ज़ की आ जाएँगी
सभ्यता-ओ-संस्कृति बेमौत मारी जाएँगी
-देवेन्द्र माँझी
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