67. जो हक़ीक़त है उसे कल्पित कहानी मत करो
जो हक़ीक़त है उसे कल्पित कहानी मत करो
वक़्त झुँझला जाएगा तुम छेड़खानी मत करो
फिर तमाशा इक नया हो जाएगा इस शहर में
होंठ में रहने दो बातें, तुम ज़बानी मत करो
कर दिया उसने अगर कुछ भूलवश, छोड़ो उसे
अब दिखाकर उसको शीशा पानी-पानी मत करो
तुम मुझे जीने भी दो अपनी तरह से दोस्तो
मुझपे तुम इस्लाह की ये मेहरबानी मत करो
फेंक दो "माँझी" तुम्हीं दर्पण को नदिया में कहीं
मुझको ही इस दौर में तुम मेरा सानी मत करो
-देवेन्द्र माँझी
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