59. देखकर मुझको अगर मातम-सा छाया है यहाँ
देखकर मुझको अगर मातम-सा छाया है यहाँ
किसलिए फिर आपने मुझको बुलाया है यहाँ
मैं मुहब्बत की कसौटी का खरा कुन्दन हुआ
आपने उस आग में मुझको तपाया है यहाँ
कोई भी रक़्क़ास ऐसे दौर से गुज़रे नहीं
ज़िन्दगी ने क़दर मुझको नचाया है यहाँ
मैं अगर सूरज नहीं बनता तो क्या करता यहाँ
धुंध-सा सबके ज़ेहन पर जबकि छाया है यहाँ
हाथ खाली हैं मगर माथे पे "माँझी" बल भी हैं
क्या पता क्या सोचकर तूफ़ान आया है यहाँ
-देवेन्द्र माँझी
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