25. सिक्के के पहलू की मानिन्द एक थे तुम और दूजा मैं
सिक्के के पहलू की मानिन्द एक थे तुम और दूजा मैं
जब तुम थे अच्छे की सफ़ में, कैसे होता अच्छा मैं
भागादौड़ी की दुनिया में कब रहता है याद भला
अपनी गर्दन पर रक्खे हूँ जाने किसका चेहरा मैं
ख़ुशफ़हमी पाले लोगों को मुझसे थीं उम्मीद बहुत
जिस पर भटके ख़ूब मुसाफ़िर था वो एक तिराहा मैं
दिल में और ज़ुबाँ में अन्तर क्या है इससे ही जानो
आज अयोध्या भी मैं ख़ुद हूँ और बना हूँ लंका मैं
धूप, जफ़ा-ओ-धुंध सरीखे कितने तूफ़ाँ थे सर पर
टूटी कश्ती लेकर "माँझी" कब-तक लड़ता तन्हा मैं
-देवेन्द्र माँझी
09810793186
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