58. यक्ष-प्रश्नों के अगर उत्तर लिखूँगा
यक्ष-प्रश्नों के अगर उत्तर लिखूँगा
ज़िन्दगी को मैं सदा चक्कर लिखूँगा
जो ज़रा से ताप से पिघले हमेशा
आबरू को मोम का इक घर लिखूँगा
प्रेम की लिखना इबारत गर ख़ता है
मैं लिखूँगा और ये दर-दर लिखूँगा
जो हलाहल को पचा ले कंठ में ही
मैं उसे भगवान शिवशंकर लिखूँगा
गर चुनौती दी नहीं तूफ़ान को अब
नाम "माँझी" का यहाँ कायर लिखूँगा
-देवेन्द्र माँझी
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