54. सुन ज़रा, वो शख़्स है टूटा हुआ, बिखरा हुआ
सुन ज़रा, वो शख़्स है टूटा हुआ, बिखरा हुआ
जिसके होंठों पर दिखे है कहकहा चिपका हुआ
एक तेरी बदतमीज़ी का मुझे अफ़सोस क्यों
सारे आलम से अदब है आज जब रूठा हुआ
जानता है वो पड़ौसी उसने तो देखा है सब
क्या तपन-ओ-रौशनी देता है घर जलता हुआ
है पता पर पूछते हैं बनके सब अनजान-से
मुस्कराहट का तेरी अब क्या हुआ, अब क्या हुआ
ख़ुशनसीबी आपकी "माँझी" जो कश्ती आ गई
वरना दरिया ने था सचमुच और ही सोचा हुआ
-देवेन्द्र माँझी
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