Tuesday, May 31, 2016

339. लिखूँ भी क्या भला अब मैं नया-सा 


लिखूँ भी क्या भला अब मैं नया-सा
सभी कुछ तो लगे पहले कहा-सा

मुहब्बत की इबारत लिख रहा हूँ
अलग बैठा हूँ यूँ हारा-थका-सा

उसी ने पार की सीमाएँ सारी
मुझे जो शख्स लगता था भला-सा

सचाई कह गए जब होंठ मेरे
ज़माना हो गया मुझसे ख़फ़ा-सा

न तू अब कर नदी की बात 'माँझी'
मुझे लगता है सब-कुछ डूबता-सा
                         -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

LikhuuN bhi kyaa bhalaa ab maiN nayaa sa
sabhi kuchh to lagey pahle kahaa sa

Muhabbat kii ibaarat likh rahaa hooN
Alag baiTHaa huuN yooN haara-thakaa sa

Usee ne paar kee seemaaeN saarii
Mujhe jo shakhs lagtaa tha bhalaa sa

Sachaaii kah gaye jab hoNTH mere
Zamaana ho gayaa mujh se KHafaa sa

Na too ab kar nadii kii baat "Manjhi"
Mujhe lagtaa hai sab-kuchh doobtaa sa

                            ~ Devender Manjhi

Monday, May 30, 2016

338. कैसे होंगे दुनिया वालो  आँखों  के साकार सपन 


कैसे होंगे दुनिया वालो  आँखों  के साकार सपन
पहले तो धरती बाँटी थी, बाँट रहे हो आज गगन

देख पराई मस्ती को क्यों टीस उठी जाती है ये
मन तो पावन मन्दिर है मत रक्खो इसमें आग-जलन

अपने क़द को तुम ही नापो, तुम ही उस पर नाज़ करो
तुमसे अपनी तुलना कैसी, तुमको बारम्बार नमन

और पता मैं लिखवा दूँ तो झूठा फर्जी होगा वो
जिसमें रहता हूँ मुद्दत से उस घर का है नाम 'बदन'

ढूँढ रही है दुनिया क्यों अब उस गुमनाम फ़रिश्ते को
'माँझी' बनकर देख रहा था जो लहरों का चाल-चलन
                                                        -देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)

Kaise hoNge duniya waalo, aankhoN ke saakaar sapan ...
Pahle to dhartii baaNTee thi, baaNT rahe ho aaj gagan ...

Dekh paraaii masti ko kyoN Tees uTHee jaati hai ye ...
Man tou paawan mandir hai, mat rakho is meiN aag-jalan ...

Apne qad ko tum hi naapo, tum hi us par naaz karo ...
Tum se apnii tulnaa kaisi, tum ko baarambaar naman ...

Aur pataa maiN likh.vaa dooN tou jhooTHaa farzee hogaa vo ...
Jis meiN rahtaa hooN muddat se, us ghar ka hai naam 'badan'

DHooNDH rahii hai duniya kyoN ab us ghum.naam farishte ko ...
"Manjhi" ban kar dekh rahaa tha, jo lehroN ka chaal-chalan

                                                                 ~ Devender Manjhi

Wednesday, May 25, 2016

337. सबसे तो कर ली पहचान 


सबसे तो कर ली पहचान
ख़ुद से है अब तक अंजान

रख ले होंठों पर मुस्कान
इतना कर ले, मेरी मान

माँगे से कब मिलते हैं
प्यार, भरोसा औ' सम्मान

आपस में क्यों लड़ती हैं
गीता, बाईबिल औ' कुरआन

इन्सानों में देखे हैं
पीर, पयम्बर औ' शैतान

अब चलने की बारी है
बाँध लिया सारा सामान

सबकी आँखों में 'माँझी'
ठहरा-ठहरा सा तूफ़ान
                    -देवेन्द्र माँझी

('हादिसा हूँ मैं' से)

Tuesday, May 24, 2016

336. इसी भँवर से हर एक शख़्स को गुज़रना है 


इसी भँवर से हर एक शख़्स को गुज़रना है
हिसार पानियों का टूटकर बिखरना है

सज़ाएँ सच से मुझे दूर कर न पाएँगी
ये जुर्म है तो मुझे बार-बार करना है

तेरी जुदाई में रो-रोके एक दिन एे दोस्त
ये सारा दश्त मुझे आँसुओं से भरना है

ये सोचकर मैं कभी छाँव में नहीं बैठा
गई रुतों का यहाँ क़ाफ़िला ठहरना है

बहुत-से लोग हैं टूटी-सी नाव में ' माँझी'
उभरते-डूबते दरिया के पार उतरना है
                              -देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हिसार=घेरा, २. दश्त=जंगल। 

Isee bhaNvar se har ek shaKHs ko guzarnaa hai
Hisaar paaniyoN ka TooTkar bikharnaa hai

SazaaeN sach se mujhe door kar na paaeNgee
Ye jurm hai tou mujhe baar-baar karnaa hai

Teri judaaii meiN ro - ro ke ek din ae dost
Ye saara dasht mujhe aaNsuoN se bharnaa hai

Ye soch kar maiN kabhi chhaaNv MeiN nahiN baiTHaa
Gaii rutoN ka yahaaN qaafilaa THaharnaa hai

Bahut se log haiN TooTee si naav meiN 'Manjhi'
Ubharte- Doobte dariya ke paar utarnaa hai

~ Devender Manjhi

Hisaar = Gheraa
Dasht = Jangal

Monday, May 23, 2016

335. अपने आँगन में धूल  की बातें 


अपने आँगन में धूल की बातें
क्यों करें हम फ़िज़ूल की बातें

ना-नुकर की बहुत ही पहले तो
और फिर सब क़बूल की बातें

मैंने पाये हैं ज़ख़्म ही उनसे
मुझसे छेड़ो न फूल की बातें

शाख और पत्तियों में उलझे सब
कोई करता न मूल की बातें

आज दरिया में खो गया 'माँझी'
रास आईं न कूल की बातें
                      -देवेन्द्र माँझी

-शब्दार्थ--१. मूल=जड़, २. कूल=किनारा।

('हादिसा हूँ मैं' से)
Apne aaNgan meiN dhool ki baateiN
KyoN kareiN ham fizool ki baateiN

Naa-nukur kee bahut hi pehle tou
Aur phir sab qubool ki baateiN

MaiN ne paaye haiN zaKHm hi un se
Mujh se chheDo na phool ki baateiN

Shaakh aur pattiyoN mein uljhe sab
Koi kartaa na mool* kee baatein

Aaj dariya mein kho gayaa "Manjhi"
Raas aayii na kool* kii baatein

~ Devender Manjhi

* mool = asal, jaD,
* Kool = kinaaraa

Sunday, May 22, 2016

334. धूप के लम्बे दरख़्तों के तले 


धूप के लम्बे दरख़्तों के तले
जल उठे नाज़ुक बदन सब छाँव के

 जब इन्हीं पर धूल की परतें जमीं
क्या बताएँगे हक़ीक़त आईने

याद के साये ने मुझको जब छुआ
बह चली रक्तिम नदी क्यों आँख से

जाने क्या अनहोनी होगी आज फिर
काँपते हैं सब परिन्दे शहर के

जूझता था जिनसे 'माँझी' आज तक
वो  नए तेवर लिये तूफ़ान थे
                  -देवेन्द्र माँझी
('हादिसा हूँ मैं' से )

Dhoop ke lambey daraKHtoN ke taley
Jal uTHey naazuk badan sab chhaaNv ke

Jab inhiN par dhool ki parteiN jameeiN
Kyaa bataayeNge haqeeqat aaiine

Yaad ke saaye ne mujh ko jab chhuaa
Beh chalee raktim* nadee kyoN aankh se

Jaane kyaa anhonee hogii aaj phir
KaaNp'te haiN sab parinde shehar ke

Joojhtaa thaa jinse "Manjhi" aaj tak
Vo naye tevar liye toofaan they

~ Devender Manjhi

* Raktim = khoon aalooda, khoon ke raNg ka, lahoo.gooN, khooNaab

Friday, May 20, 2016

333. यूँ तो हमारे साथ ही वो भी सफ़र में था 


यूँ तो हमारे साथ ही वो भी सफ़र में था
लेकिन न जाने कौन से  अनजाने डर में था

मातम हरेक फूल के चेहरे पे लिख गया
धब्बा जो एक ख़ून का तितली के पर में था

आँखों को चीरता गया अख़बार सुबह का
एक ऐसा ख़ूनी हादिसा पहली ख़बर में था

अनजान मैं बना रहा कुछ बात सोचकर
जो मुझसे छुप रहा था वो मेरी नज़र में था

ललकारते हो किसलिए बेबस परिन्द को
जितना भी ज़ोर उसका था, सब बालो-पर में था

हासिल हुई न पानी की दो-चार बूँद भी
'मांझी' तो बस सुराब के तपते भँवर में था
                                             -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--१. बालो-पर=पंख और डैने, २. सुराब=मृगमरीचिका।

(हादिसा हूँ मैं' से)

Tuesday, May 17, 2016

 332. आंसुओ! ठहरो! न आओ मुस्कुराने के लिए 


आंसुओ! ठहरो! न आओ मुस्कुराने के लिए
लोग सब बेताब हैं बातें बनाने के लिए

चील, कव्वे, गिद्ध ही क्यों इस क़दर बदनाम हैं
दोस्त भी कुछ कम नहीं हैं नोंच खाने के लिए

मैं नहीं ईसा बना तो इसमें उसका क्या क़ुसूर
शहर तो तैयार है सूली सजाने के लिए

गाँव  से मुझको भी काफ़ी प्यार है पर क्या करूँ
कोई कहता ही नहीं है लौट आने के लिए

ले चलो 'मांझी'  ये कश्ती, दूर साहिल से कहीं
और क्या-क्या हम सहें, ज़ालिम ज़माने के लिए
                                                 देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)


AansuoN ! THahro ! na aao muskuraane ke liye ...
Log sab betaab haiN baateN banaane ke liye ...

Cheel, kavvey, giddh hee kyoN is qadar badnaam haiN ...
Dost bhi kuchh kam nahiiN haiN noch khaane ke liye ...

MaiN naheeN EISAA banaa tou ismeiN us ka kyaa qusoor ...
Shahar tou taiyyaar hai soolee sajaane ke liye ...

GaaNv se mujh ko bhi kaafi pyaar hai par kyaa karooN ...
Koi kahtaa hi nahiiN hai lauT aane ke liye ...

Le chalo 'Manjhi' ye kashtii door saahil se kahiiN ...
Aur ham kya-kya saheiN, zaalim zamaane ke liye ...

                                               ~ Devender Manjhi

Monday, May 16, 2016

331. शोख़ मंज़र है कोई रूप सुनहरा जैसे 


शोख़ मंज़र है कोई रूप सुनहरा जैसे
याद आ जाए है वो चम्पई चेहरा जैसे

मैंने चढ़-चढ़के फ़सीलों पे सदायें दी हैं
कोई सुनता ही न था शहर हो बहरा जैसे

सोचकर बारहा दरवाज़े  लौट आया हूँ
मेरे दुश्मन का हो उस शख़्स पे पहरा जैसे

ऐसे गुज़रा हूँ झुलसते हुए सहराओं से
ठण्डी छाँव में कोई काफ़िला ठहरा जैसे

ज़िन्दगी मौजे-हवादिस में ही गुज़री 'माँझी'
नाव के साथ बहे घाव भी गहरा जैसे
                       -देवेन्द्र मांझी

Sunday, May 15, 2016

330. जब से तन्हा रहता हूँ 


जब से तन्हा रहता हूँ
सचमुच काफ़ी अच्छा हूँ

मेरी हालत क्या पूछो
शाख से टूटा पत्ता  हूँ

आँख ज़माने की भीगीं
ख़ुद से ऐसा रूठा हूँ

मुझमें-तुझमें फ़र्क़ है क्या
अब आकर मैं समझा हूँ

कहने को बस 'माँझी' हूँ
लहर-लहर में डूबा हूँ
                  -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Thursday, May 12, 2016

329. ज़िन्दगी को इस तरह ढोते नहीं 


ज़िन्दगी को इस तरह ढोते नहीं
बस करो, अब और समझौते नहीं

इन दरख़्तों से कहो इठलायें ना
फूल और पत्ते सगे होते नहीं

आँख हैं ज़िन्दा तो पल जाएँगे और
टूट जाएँ ख़्वाब तो रोते नहीं

कारवाँ की रहनुमाई के लिए
जो निकलते हैं कभी खोते नहीं

रौशनी कितनी है ये मत पूछिए
रात-भर जुगनू कभी सोते नहीं

कौन लाता नाव 'माँझी' खींचकर
हम जो अपने आप में होते नहीं
                         -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Wednesday, May 11, 2016

328. अपनी तबाहियों की दुआ माँगता हूँ मैं 


अपनी तबाहियों की दुआ माँगता हूँ मैं
सबकी नज़र में है जो वही हादिसा हूँ मैं

मुझमें अगर खरोंच है तो मेरा क्या क़सूर
सूरत है जिसमें वक़्त की वो आईना हूँ मैं

आये बहुत ही ताव में लौटे मगर उदास
जिस पर न चल सका कोई वो रास्ता हूँ मैं

लड़ता रहा हूँ रात भर इस तीरगी से मैं
आई क़रीब सुब्ह तो अब काँपता हूँ मैं

बेकार 'माँझी' तुम यहाँ पतवार लाये हो
जो कट सके किसी से न वो दायरा हूँ मैं
                                  -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. तीरगी=अँधेरा, 2.सुब्ह=प्रांत:काल।

(हादिसा हूँ मैं' से)
Apnee tabaahiyoN kii duaa maaNgtaa hooN maiN ...
Sabkee nazar meiN hai jo, vohi haadisa hooN main ...

Mujh meiN agar kharoNch hai tou mera kyaa qusoor ...
Soorat hai jis meiN waqt kii voh aaiinaa hooN maiN ...

Aaye bohot hii taav meiN lautey magar udaas
Jis par na chal sakaa koii voh raastaa hooN maiN

LaDtaa rahaa hooN raat bhar is teergii se maiN
Aaii qareeb sub'h tou ab kaaNptaa hooN maiN

Bekaar "Manjhi" tum yahaaN patwaar laaye ho ...
Jo kaT sakey kisi se na, voh daayraa hooN maiN

                                               ~ Devender Manjhi

Monday, May 9, 2016

327.  इससे पत्थर का यक़ीं लाख भला है यारो 


इससे पत्थर का यक़ीं लाख भला है यारो
मुझको शीशे के समन्दर ने छला है यारो

अब तो मुमकिन ही नहीं और में उसका ढलना
ऐसे साँचे में वो इक शख़्स ढला है यारो

जिसके होंठों पे हँसी रक़्स किया करती है
वो चराग़ों-सा हर इक रात जला है यारो

मर तो जाते हैं सभी वक़्त के मारे लेकिन
आज के दौर में जीना भी कला है यारो

नाव 'माँझी' ने बढ़ाई यही कहकर सबसे
अब तो अनदेखा जहाँ हमको भला है यारो
                                      -देवेन्द्र मांझी

शब्दार्थ--1. रक़्स=नृत्य।

(हादिसा हूँ मैं' से)

Is se patthar ka yaqeeN laakh bhalaa hai yaaro
Mujhko sheeshe ke samandar ne chhalaa hai yaaro

Ab tou mumkin hi nahiiN aur meiN uskaa DHalnaa
Aise saaNche meiN vo ik shaKHs DHalaa hai yaaro

Jis ke hothoN pe haNsii raqs kiyaa kartee hai
Vo charaaghoN sa har ik raat jalaa hai yaaro

Mar tou jaate haiN sabhi waqt ke maare lekin
Aaj ke daur meiN jeenaa bhi kalaa* hai yaaro

Naav "Manjhi" ne baDHaaii yahii kehkar sab se
Ab tou andekhaa jahaaN ham ko bhalaa hai yaaro

                                                    ~ Devender Manjhi

* kalaa = art, fan, hunar

Tuesday, May 3, 2016

326.  सांस लेने को ज़िन्दगी कह दूँ 


सांस लेने को ज़िन्दगी कह दूँ
आँख हो नम तो क्यों ख़ुशी कह दूँ

मैं अगर हूँ तो क़द्र है तेरी
तुझसे ये बात राज़ की कह दूँ

इसलिए कह रहा हूँ मेरे हो
तुमने चाहा है मैं यही कह दूँ

तू अँधेरे की सिर्फ़ चाहत है
तुझसे ये बात चाँदनी कह दूँ

रोक लो नाव टुक अभी 'माँझी'
बात अपनी मैं आख़िरी कह दूँ
                      -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Monday, May 2, 2016

325.  इतने रूप बदलता क्यों है 


इतने रूप बदलता क्यों है
साया मुझको छलता क्यों है

दर्द मेरा नग़मों में आकर
लम्हा-लम्हा ढलता क्यों है

साँप नया नित आकर मेरी
आस्तीन में पलता क्यों है

झूठ, कपट, भ्रम की भट्टी में
आख़िर मानव जलता क्यों है

ख़ून-सने पाँवों से 'माँझी'
पानी पर तू चलता क्यों है
                   -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)