भावी पीढ़ियों को भी रौशनी देती हैं उस्तादों की इस्लाहें
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ग़ज़ल आज सर्वाधिक लोकप्रिय काव्य-विधा के रूप स्थापित हो रही है तो उसका एकमात्र कारण यह है कि इसका दो पंक्तियों का एक शे'र किसी भी पाठक/ श्रोता को आह या वाह करने पर मजबूर कर देता है। शे'र के इस चमत्कार को तग़ज़्ज़ुल कहते हैं। शे'र में निखार लाने और उसमें तग़ज़्ज़ुल पैदा करने में उस्ताद शाइरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। दरअस्ल, उर्दू शाइरी में इस्लाह लेने-देने का रिवाज़ शाइरी के जन्मकाल से ही चला आ रहा है। शे'र कहना उतना मुश्किल नहीं, जितना की उसका समझना। इस सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध विद्वान् लेखक अयोध्या प्रसाद गोयलीय ने वर्ष-1966 में अपनी एक पुस्तक में ठीक ही लिखा था कि 'लगन और परिश्रम के बल-बूते पर शे'र कहने का अभ्यास तो हो सकता है, किन्तु शे'र को समझना, परखना, उसकी अच्छाई-बुराई, ख़ूबी और ऐब पर आलोचनात्मक दृष्टि पड़ना बहुत मुश्किल है। यदि नीर-क्षीर विवेक-दृष्टि सौभाग्य से प्राप्त हो भी जाए तो शे'र के ऐबों को निकालकर उसे चमका देना हर उस्ताद के वश का रोग नहीं। सोने के खरे-खोटे की परख तो सर्राफ़ कर सकता है, परन्तु उसका खोट निकालकर उसे शुद्ध बनाना उसके वश का नहीं, यह काम सुनार ही कर सकता है।'
'इस्लाह देने की क्षमता केवल---छन्दशास्त्र, अलंकार, साहित्य आदि में पारंगत होने से नहीं आती, अपितु उसके लिए ----शाइराना सूझ-बूझ, स्वानुभव और विवेक-बुद्धि भी अत्यन्त आवश्यक है। इस्लाह से न सिर्फ़ शागिर्द को ही लाभ पहुँचता है, अपितु उस्ताद का अभ्यास भी बढ़ता है और निरन्तर उसके काव्य-कौशल में निखार आता चला जाता है तथा नई-नई जानकारियों के लिए अध्ययन की भी प्रवृत्ति बढ़ती जाती है, ताकि वह अपने शिष्यों को इस कला में पारंगत कर सके। उस्तादों के मुद्रित कलाम से यह तो ज्ञात हो सकता है कि वे स्वयं क्या कहते थे और कैसा कहते थे, किन्तु उनकी समालोचक दृष्टि और सूझ-बूझ का अनुमान तो उनके द्वारा दी गईं इस्लाहों से ही हो सकता है कि शागिर्द ने क्या कहा और उस्ताद ने तनिक-से संशोधन से उसे क्या बना दिया?'
'इस्लाह' के सम्बन्ध में सफ़दर मिर्जापुरी की सोच कुछ ज़ियाद: ही सार्थक और दूर तक जानेवाली साबित हो रही है। वे सोचते थे कि उस्ताद अपने शागिर्द को इस्लाह देता है और शागिर्द उस संशोधन के हिसाब से अपना शे'र ठीक कर लेता है तो इसमें न तो यह पता चलता है की शागिर्द ने पहले अपना शे'र क्या कहा था और न ही यह पता लगता है कि उस्ताद ने अपने शागिर्द को क्या इस्लाह दी। इतना ही नहीं, सफ़दर साहब यह भी सोचते थे कि जो ग़लतियाँ आज का शाइर कर रहा है, ऐसी ग़लतियों को भविष्य के शाइर भी तो कर सकते हैं, फिर उन्हें समझाने आज के उस्ताद शाइर कहाँ से आएँगे ? ऐसे में अगर इन इस्लाहों का संकलन कर लिया जाए तो ये भावी पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करने में कारगर साबित होंगी। इस विचार के दिमाग़ में आते ही उन्होंने उन इस्लाहों को एकत्रित करने का निर्णय कर डाला। वे उस्तादों द्वारा दी गईं इस्लाहों को एकत्रित करने के लिए दीवानों की तरह लखनऊ के गली-कूचों में उस्तादों के दरों की ख़ाक छानने लगे। शुरू-शुरू में कुछ ने यह कहकर उन्हें टरकाया---"हमारे कलाम पर उस्ताद ने इस्लाह देने की ज़रुरत ही महसूस नहीं की और हमने अपने शागिर्दों को दी गईं इस्लाहों की नक़ल नहीं रक्खी।" कुछ ने यह कहकर चलता किया ---"हमें जो इस्लाहें दी गईं थीं, उन्हें हमने अपनी ब्याज (कविता संकलन) में नोट करने के बाद ज़ाया (नष्ट) कर दिया। अगर यह मालूम होता कि कोई अदीब इस्लाहों को भी शाया (प्रकाशित) करेगा तो सहेजकर रख लेते।" लेकिन सफ़दर निराश नहीं हुए। वे अपनी धुन के पक्के थे। तीन वर्ष तक लगातार भाग-दौड़ करने पर वर्ष-1918 में इस्लाहों का प्रथम संकलन 'मुश्शानए-सुखन', सिद्दीक़ बुक डिपो लखनऊ, और वर्ष-1928 में द्वितीय संकलन लाहौर के प्रकाशक 'ताजराने-कुतुब' से प्रकाशित कराने में सफल हो ही गए। पहले संकलन में 37 उस्तादों की इस्लाहें और दूसरे में 62 उस्तादों की इस्लाहें संकलित थीं। सफ़दर साहब ने सचमुच ऐसी नायाब पुस्तक तैयार करके दी कि जो आज तक भी नए शाइरों को रौशनी दिखा रही है। आइये, इस पुस्तक में दी गईं कुछ इस्लाहों पर नज़र डालते हैं--
'राज़' अहसनी बहुत ऊँचे दर्ज़े के शाइरों में शुमार होते हैं और उन्हें उस्तादी का मर्त्तबा भी हासिल था। उन्होंने शे'र कहा ---
"हमारे आशियाँ से आस्माँ तक रोक ही क्या थी
बलाए-बर्क़ से महफूज़ क्योंकर आशियाँ करते"
देखने-सुनने में बहुत अच्छा शे'र है, किन्तु बाबए-उर्दू 'जोश' मलसियानी-जैसे वयोवृद्ध और सिद्धहस्त की आलोचक दृष्टि से शे'र की ये तनिक-सी ख़ामी छिपी न रह सकी। बिजली आसमान से ज़मीं पर गिरती है। अत: बिजली की रवानगी के मुक़ाम का उल्लेख पहले और मंज़िल पर पहुँचने का बाद में होना चाहिए था। अत: उन्होंने शे'र के पहले मिस्रे को इस तरह परिवर्तित कर दिया--
"रुकावट कौन-सी थी चर्ख़ से शाख़े-नशेमन तक"
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स्वानुभव की कमी के कारण भी कभी-कभी ऐसी भूलें हो जाती हैं कि अच्छे-अच्छे उस्ताद उन अस्वभाविकताओं को नहीं भाँप पाते। 'अहसान' माहरहरवी मिर्ज़ा 'दाग़' के योग्य शिष्य थे। शिष्यों की डाक द्वारा आई हुई ग़ज़लों को अक्सर वे पढ़कर दाग़ साहब को सुनाते थे और जो इस्लाह उस्ताद फ़रमाते थे, लिखकर शिष्यों को वापस भिजवा देते थे। ऐसे दक्ष शागिर्द जब अपना यह शे'र इस्लाह के लिए पेश किया
"किसी दिन बेख़ुदी में जा पड़े थे उनके सीने पर
बस इतनी-सी ख़ता पर हाथ कुचले उसने पत्थर से"
मिर्ज़ा दाग़ के पास बैठी हुई तवायफ़ शे'र सुनकर मुस्कुराई। अहसन तो बेचारे मौलाना और ज़ाहिदे-ख़ुश्क थे। इस मुस्कान का रहस्य समझना उनकी समझ से बाहर था, किन्तु मिर्ज़ा दाग़-जैसा स्वानुभवी भाँप गया। फ़रमाया --"बेख़ुदी में केवल एक ही हाथ सीने पर पड़ना मुमकिन है, दोनों हाथ तो अनजाने में नहीं जान-बूझकर ही पड़ते हैं। शे'र यूँ बना लो---
"किसी दिन बेख़ुदी में जा पड़ा था उसके सीने पर
बस इतनी-सी ख़ता पर हाथ कुचला उसने पत्थर से"
मिर्ज़ा सुलेमान जाह 'अंजुम' उस्ताद हैदरअली तबातबाई 'नज़्म' से अपनी ग़ज़ल पर इस्लाह लेकर जा रहे थे कि रास्ते में नवाब अख़्तर महल बेगम को सलाम करने के लिए उनके दौलतख़ाने पर चले गए। बेगम साहिब शायरा तो न थीं, हाँ सुख़न-फ़हम ज़रूर थीं ताज़ा ग़ज़ल सुनाने की फ़रमाइश पर अपनी इस्लाहशुदा ग़ज़ल पढ़नी शुरू की। जब यह शे'र पढ़ा---
"दम मेरा निकला तेरे वादे के साथ
तेरी घबराई हुई हाँ की तरह"
…तो बेगम ने मुस्कुराते हुए पूछा---क्या उसने घबराकर कहा था कि 'हाँ'? फिर फ़रमाया यूँ पढ़िए--
"दम मेरा निकला तेरे वादे के साथ
तेरी शरमाई हुई हाँ की तरह"
दरअसल, उस्ताद ने इस्लाह तो दे दी परन्तु नारी-सुलभ इस अदा का अनुभव न होने से मात खा गए। शे'रो-शाइरी ऐसा असीम सागर है जिसमें अच्छे-अच्छे तैराक गोते खा जाते हैं। 'हातिम' अपने ज़माने में बहुत अच्छा उस्तादाना मर्त्तबा रखते थे। अपने कुछ शागिर्दों के साथ बैठे हुए थे। फ़रमाइश पर अपनी ग़ज़ल का यह मतला पढ़ा---
"सर को पटका है कभू, सीना कभू कूटा है
रात हम हिज्र की दौलत से मज़ा लूटा है"
शागिर्दों में मियाँ सआदत खां 'रंगीं' भी बैठे हुए थे उन्होंने बा-अदब अर्ज़ किया---'उस्ताद मतला तो बहुत अच्छा है लेकिन दूसरे मिस्रे में ज़रा-सी तरमीम की ज़रुरत है।' उस्ताद ने पूछा--'वो क्या?' रंगीं ने हाथ बाँधकर अर्ज़ किया--'मेरी नाक़िस राय से दूसरा मिस्रा यूँ रहना चाहिए ---
"हमने शबे-हिज्र की दौलत से मज़ा लूटा है"
उस्ताद ने ग़ौर किया तो मालूम हुआ कि 'हम लूटा है' भाषायिक दृष्टिकोण से अशुद्ध है। 'हमने लूटा है' कहना चाहिए था। उस्ताद ने रंगीं की इस इस्लाह को बेतकल्लुफ़ क़ुबूल कर लिया और सबके सामने रंगीं की सराहना भी की
जैसी भाषाई चूक, और स्वानुभव की कमी से शे'र में कमी पहले रहती थीं, वैसी ही संभावना अब भी रहती है मगर समझदार शाइर अपने उस्ताद से इस्लाह लेकर और इस पुस्तक में दी गईं पुराने उस्ताद शाइरों की इस्लाहों को पढ़कर अपनी कमियाँ दूर करने का प्रयास तो करते ही हैं, शायरी को समृद्ध भी बनाते हैं
--प्रस्तुति : देवेन्द्र माँझी
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