Tuesday, November 24, 2015

258. देखी को अनदेखी कर, क्या बाहर क्या भीतर है 


देखी को अनदेखी कर, क्या बाहर क्या भीतर है
मन को पीड़ा क्यों देता है ये क़िस्सा तो घर-घर है

फिर क्यों ना विश्वास करें हम पथरीली इस दुनिया का
जान गए हैं जब इतना सच शीशा भी इक पत्थर है

बात तो कोई होगी ही जो थाम के ग़ज़लों का दामन
आग लगाने आता है जो बढ़-चढ़ हर इक अक्षर है

देख के मुझको सब पूछेंगे इतना तो ये दावा है
वो जो गुज़रे राहगुज़र से आख़िर किसका लश्कर है

'माँझी' इसका मोह भी त्यागो, जाने भी दो इसकी बात
सारी दुनिया और नहीं कुछ केवल स्याह समन्दर है
                                                    -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

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