257. देखकर दीवार गिरती रो पड़ी छत
देखकर दीवार गिरती रो पड़ी छत
मुफ़्त में हो जाएगी मेरी फ़ज़ीयत
पूछ ही लें सच के मानी आज उनसे
दे रहे हैं सच की जो हमको नसीहत
हाँ, जवानी में जो वापस लौट आये
पढ़ रहे हैं अब बुढ़ापे में वही ख़त
जानकी, द्रोपद, अहिल्या रो रही हैं
वक़्त ने उनको किया हर बार आहत
नाव से 'माँझी' निकलकर चल दिया जब
मिल गई सारे समन्दर को ही राहत
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. फ़ज़ीयत =निन्दा, अपयश, रुस्वाई, 2. मा'नी=अर्थ, मतलब।
(मजबूरियाँ मेरी' से)
No comments:
Post a Comment