Friday, October 30, 2015

243. सबको चक्कर में डालकर निकला 


सबको चक्कर में डालकर निकला
ऐसा फ़िकरा उछाल कर निकला

खा गया ठोकरें ज़माने की
ख़ाक वो देख-भालकर निकला

किसको दीखा वो भोर का तारा
जब वो सूरज निकालकर निकला

दिल की कालिख छुपा नहीं पाया
लाख ख़ुदको उजालकर निकला

कुछ न आया था हाथ 'माँझी' के
जब वो दरिया खंगालकर निकला
                             -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

242. वक़्त की इस चाल को अब मोड़ दे 


वक़्त की इस चाल को अब मोड़ दे
ख़ून पीती रूढ़ियों को तोड़ दे

आप दे देगा उड़ानों के सबूत
इस परिन्दे को खुला तू छोड़ दे

हाथ में अब आब ले सच्चाई का
झूठ की गगरी को अब तू फोड़ दे

लोग पढ़ लेंगे तुझे इतिहास में
इक नया अध्याय इसमें जोड़ दे

हर कोई कहता मिला 'माँझी' से ये
इस नदी के पार मुझको छोड़ दे
                          -देवेन्द्र माँझी

241. इससे तो बेकारी अच्छी 


इससे तो बेकारी अच्छी
हाथ कटाकर मिलती रोज़ी

बिन इसके भी काम चले ना
बेशक ये माया है ठगनी

रोम जले तो जलने भी दो
नीरो की बजती है बंसी

आज अदब की हर महफ़िल है
चौराहे की सब्ज़ी-मण्डी

किस-किसको ये पार करेगी
जर्जर होती 'माँझी' कश्ती
                   -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. रोज़ी=आजीविका, 2. अदब=साहित्य। 

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Thursday, October 29, 2015

240. सम्बन्धों ने आँख तरेरी इधर-उधर 


सम्बन्धों ने आँख तरेरी इधर-उधर
आज लगी है तेरी-मेरी इधर-उधर

नंगापन अब झूम रहा है बना-ठना
लाज-शरम फ़ैशन ने घेरी इधर-उधर

देख के चेहरा कोई डरे ना इसीलिये
आज मुखौटों की है फेरी इधर-उधर

बैठी है थक-हार के युग की नई हवा
 थाम निराशाओं की ढेरी इधर-उधर

ख़ौफ़ज़दा 'माँझी' सागर से निकल गया
लहर बनीं तूफ़ाँ की चेरी इधर-उधर
                                  देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से) 

Sambandho'n ne aa'nkh tarerii idhar-udhar
Aaj lagii hai teri-meri idhar-udhar

Na'ngaapan ab jhoom rahaa hai banaa-THanaa
Laaj-sharam faishan ne gheri idhar-udhar

Dekh ke chehraa koi darey naa isiiliye
Aaj mukhauTo'n ki hai pheri idhar-udhar

baiTHee hai thak-haar ke yug ki na.ii hawaa
Thaam niraashaao'n ki DHerii idhar-udhar

KHaufzadaa 'Manjhi' saagar se nikal gayaa
Lahar banii'n toofaa'n ki cherii idhar-udhar

-Devender Manjhi

( " Majbooriyaa'n meri" se )

Tuesday, October 27, 2015

239. जब वो ज़ाहिर हुआ दीवार का साया बनके 


जब वो ज़ाहिर हुआ दीवार का साया बनके
रह  गई  सारी  ख़ुदाई  भी  तमाशा  बनके

हो सकी हमसे न पहचान की किस हाल में था
वो  नमूदार  हुआ  बज़्म  में क्या-क्या  बनके

ज़िन्दगी होगी यो फ़ुर्क़त में गुज़र जायेगी
 क्या करेगा वो मेरे ग़म का मुदावा बनके

इक मुसाफ़िर था पहुँचना था जिसे मंज़िल पर
उसको  लूटा  है  सरे-राह  फ़रिश्ता  बनके

झील होती तो मुहब्बत के कँवल खिल जाते
तूने दिल तोड़ दिया 'माँझी' का दरिया बनके
                                          देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. नमूदार=प्रकट, 2. बज़्म=महफ़िल, 3. फ़ुर्क़त=जुदाई, 4. मुदावा=इलाज।

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Jab vo zaahir hu.aa deewaar ka saaya ban ke
Rah ga.ii saari khudaa.ii bhi tamaasha ban ke 

Ho saki hamse na pahchaan ki kis haal me'n tha 
Vo namuudaar hu.a bazm me'n kya-kya ban ke 

Zindagi hogi yo'n furqat me'n guzar jaayegi 
Kya karega vo mere gham ka mudaawa ban ke 

Ik musafir tha pahu'nchnaa tha jise manzil par 
Usko lootaa hai sar-e-raah farishtaa ban ke 

Jheel hoti to muhabbat ke ka'nwal khil jaate 
Tuu ne dil toRR diya 'Manjhi' ka dariya ban ke 
                                           -Devender Manjhi 
1. Namoodaar = prakat 2. Bazm = mahfil 3. Furqat = judaai 4. Mudaawa = ilaaj

Monday, October 26, 2015

238.  आँखों-आँखों में कह जाए बात तो कोई होगी ही 


आँखों-आँखों में कह जाए बात तो कोई होगी ही
होंठ मगर वो खोल न पाए बात तो कोई होगी ही

भूख बढ़ी कुछ ज़्यादा ही या सूखे अंकुर ग़ैरत के
रोटी में अस्मत बिक जाए बात तो कोई होगी ही

चेहरे-मोहरे से तो यारो मैं भी बुरा नहीं लगता
मुझपर ही पत्थर बरसाए बात तो कोई होगी ही

पाँवों के नीचे खुंदना ही जिसकी क़िस्मत में लिक्खा
धूल उड़े और सर पर आए बात तो कोई होगी ही

लहरें बढ़-चढ़ पाँव पखारें 'माँझी' तेरी कश्ती के
तूफ़ाँ ख़ुद ही पार लगाए बात तो कोई होगी ही
                                              -देवेन्द्र माँझी


('मजबूरियाँ मेरी' से)

Aankho'n-aankho'n me'n kah jaaye baat to koi hogi hii 
Ho'nTH magar vo khol na paaye baat to koi hogi hii 

Bhookh baRhi kuchh zyaada hi ya suukhe a'nkur ghairat ke 
RoTii me'n asmat bik jaaye baat to koi hogi hii 

Chehre-mohre se to yaaro mai'n bhi bura nahi'n lagtaa 
Mujh par hi patthar barsaaye baat to koi hogi hii 

Paa'nvo'n ke niiche khu'ndanaa hii jiski qismat me'n likkhaa 
Dhool uRRe aur sar par aaye baat to koi hogi hii 

Lahre'n baRh-chaRh paa'NV pakhaare'n 'Manjhi' teri kashti ke 
Toofaa'n khud hi paar lagaaye baat to koi hogi hii 
                                                                        -Devender Manjhi

Sunday, October 25, 2015

237.  क्यों न उसने तब किया कुछ, जब मिले मौक़े कई 


क्यों न उसने तब किया कुछ, जब मिले मौक़े कई
सर भिड़ाकर इस बहस में उलझे दीवाने कई

वो भला मोहताज कब था एक रस्ते के लिए
मंज़िलों की कोख से पैदा किये रस्ते कई

क्या दशानन बनने की ठानी है मन में आपने
एक गर्दन पर रखे हैं किसलिए चेहरे कई

ख़ाक वो हँस पाएगा इस दौर में तुम ही कहो
कर लिए हैं ज़िन्दगी से जिसने समझौते कई

'माँझी' कैसे ले गया कश्ती भँवर के पार फिर
एक होकर भिड़ रहे थे उस जगह धारे कई
                                                -देवेन्द्र माँझी


('मजबूरियाँ मेरी' से)

Kyo'n na usne tab kiyaa kuchh, jab mile mauqe ka.ii 
Sar bhiRRaakar is bahas me'n uljhe deewaane ka.ii 

Vo bhalaa mohtaaj kab tha ek raste ke liye 
Manzilo'n kii kokh se paidaa kiye raste ka.ii 

Kyaa 'dashaanan' ban.ne ki THaani hai man me'n aap ne 
Ek gardan par rakhe hai'n kisliye chehre ka.ii 

KHaak vo ha'ns paaegaa is daur me'n tum hi kaho 
Kar liye hai'n zindagii se jisne samjhaute ka.ii 

'Manjhi' kaise le gayaa kashti bha'nwar ke paar phir 
Ek hokar bhiRR rahe the us jagah dhaare ka.ii 
                                          -Devender Manjhi 
'Dashaanan' = das siro'n waala, das chehre waala, das aql/ dimaag waala.... Hindu Mythological character...'Raavan' then king of 'Sri Lanka'...

Thursday, October 22, 2015

236. पत्थरों की झील में हुबाब देखते रहे

पत्थरों की झील में हुबाब देखते रहे
ज़िन्दगी में इक नया ख़्वाब देखते रहे

उलटे-सीधे फ़लसफ़ों में डूबकर हम रोज़ ही
उलझनों की नित नई किताब देखते रहे

शराफ़तों की मस्नूई-वो-पुरकशिश भली-भली
क़ातिलों के रुख पे हम नक़ाब देखते रहे

चिलचिलाती धूप में दौड़ती हैं हिरनियाँ
रेत के जज़ीरे में सुराब देखते रहे

'माँझी' कुछ पता नहीं नदी के ओर-छोर का
लहर-लहर नाव में गर्दाब देखते रहे
                                   -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. हुबाब=बुलबुले, 2. मस्नूई=बनावटी, 3.पुरकशिश=आकर्षक, 4. जज़ीरे में=टापू में, 5. सुराब=धोका, मृगमरीचिका, 6. गर्दाब=तूफ़ान।

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Pattharo'n ki jheel me'n hubaab dekhte rahe 
Zindagi me'n ik nayaa khwaab dekhte rahe 

Ulte-sidhe falsafo'n me'n duubkar ham roz hi 
Uljhano'n ki nit naii kitaab dekhte rahe 

Sharaafato'n ki masnuuii-wo-purkashish bhali-bhali 
Qaatilo'n ke rukh pe ham naqaab dekhte rahe 

Chilchilaatii dhoop me'n dauRRtii hai'n hiraniyaa'n 
Reit ke jaziire me'n suraab dekhte rahe 

'Manjhi' kuchh pataa nahi'n nadee ke or-chhor ka 
Lahar lahar naav me'n gardaab dekhte rahe 
                                                -Devender Manjhi 


1. Hubaab = Bulbule 2. Masnuuii = BanaavaTii 3. Purkashish = Aakarshak 4. Jaziire me'n = Taapuu me'n 5. Suraab = Dhokaa, Mrig.mareechikaa 6. Gardaab = Toofaan

Tuesday, October 20, 2015

235. नाम लिये हैं तूने जिनके 


नाम लिये हैं तूने जिनके
अगले हिस्से हैं वो पिन के

रंग, चमन, ख़ुशबू और वो
सब क़ातिल हैं मेरे दिन के

इनके जी में क्या है समझो
चेहरे मत देखो तुम इनके

आँधी लेकर साथ गई सब
छप्पर में थे जितने तिनके

आज नदी ने 'माँझी' मुझसे
ख़ूब लिया बदला गिन-गिन के
                           -देवेन्द्र माँझी

(' मजबूरियाँ मेरी' से)

Naam liye hai'n tuu ne jinke 
Agle hisse hai'n vo pin ke 

Ra'ng, chaman, khushbu aur vo
Sab qaatil hai'n mere din ke

Inke jee me'n kya hai samjho 
Chehre mat dekho tum inke 

Aa'ndhee lekar saath ga.ii sab 
Chhappar me'n the jitne tinke 

Aaj nadii ne 'Manjhi' mujhse 
Khoob liya badlaa gin-gin ke
                 -Devender Manjhi

Monday, October 19, 2015

234. दूर करी थी बाधा मैंने

दूर करी थी बाधा मैंने
तब लक्ष्यों को साधा मैंने

जब देखा सब लुट जाएगा
बाँट दिया तब आधा मैंने

अपने मन को इस कलियुग में
क्यों विपरीत ही साधा मैंने

ठीक कटे जीवन इस ख़ातिर
किस-किस को आराधा मैंने

नौ मन तेल बिना भी 'माँझी'
ख़ूब नचाई राधा मैंने
                      -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियां मेरी' से)

Door kari thi baadhaa maine
Tab Lakxyo'n ko saadhaa maine

Jab dekha sab lut jaayega
Baa'nT diya tab aadha maine

Apne man ko is Kaliyug me'n
Kyo'n Vip.reet hi saadha maine

THeek kaTe jeevan is KHaatir
Kis-kis ko aaraadha maine

Nau man teil binaa bhi 'Manjhi'
Khoob nachaaii raadha maine

-Devender Manjhi

Sunday, October 18, 2015

233  कैसी है ये धक्कमपेल 


कैसी है ये धक्कमपेल
निकला जाता सबका तेल

जब सबकी पौबारह है
तू भी भैया खुलकर खेल

कहने की तू माने ना
आन पड़ी है सर पर झेल

हम सब सिर्फ़ मुसाफ़िर हैं
दुनिया है इक चलती रेल

'माँझी' की तू चाल समझ
लहरों से करता है मेल
                 -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Friday, October 16, 2015

232.  ख़ुद को अपने आईनों में इस क़दर तुम पाओगे 


ख़ुद को अपने आईनों में इस क़दर तुम पाओगे
देखकर सच्चाइयों को ख़ुद से भी डर जाओगे

मैं अंधेरों की तरह जाकर कहीं छुप जाऊँगा
जब चराग़ों के शहर में ढूँढने तुम आओगे

पेश आओ बेरुख़ी से लाख मुझसे तुम मगर
मेरी ग़ज़लों को ही अपने होंठ पर तुम पाओगे

मेरे मरते ही सभी अपने लगे यूँ चीखने
लाश कब-तक ये सड़ेगी, कब इसे उठवाओगे

हर तरफ़ है धुन्ध की मोटी परत फैली हुई
लेके 'माँझी' कैसे कश्ती तुम किनारे जाओगे
                                            -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

Khud ko apne aaiino'n me'n is qadar tum paaoge
Dekhkar sachchaaiyo'n ko khud se bhi Dar jaaoge

Mai'n andhero'n ki tarah jaakar kahi'n chhup jaau'ngaa
Jab charaagho'n ke shahar me'n DHuu'nDHne tum aaoge

Pesh aao beruKHee se laakh mujhse tum magar
Meri ghazlo'n ko hi apne ho'nTH par tum paaoge

Mere marte hi sabhi apne lage yuu'n cheekhne
Laash kab-tak ye saRRegi, kab ise uTHwaaoge

Har taraf hai dhu'ndh ki moTi parat phailee hu.ii
Leke 'Manjhi' kaise kashti tum kinaare jaaoge

-Devendra Manjhi

Thursday, October 15, 2015

231. किर्च से भरपूर सारा गुलसिताँ हो जाएगा 

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किर्च से भरपूर सारा गुलसिताँ हो जाएगा
जब किसी शीशे पे पत्थर मेहरबाँ हो जाएगा

बिजलिओं का नाच तो देखूँगा मैं हर हाल में
और क्या है ख़ाक मेरा आशियाँ हो जाएगा

क्या कशिश रह जाएगी जाने-वफ़ा तू ही बता
फैसला जो तेरे-मेरे दरम्याँ हो जाएगा

जो हथेली पर है तेरे सामने सबके उछाल
इस तरह क़िस्मत का मेरी इम्तिहाँ हो जाएगा

तेज़ लहरें जब मुहब्बत से पुकारेंगी उसे
शर्तिया साहिल से 'माँझी' बदगुमाँ हो जाएगा
                                           -देवेन्द्र माँझी


('मजबूरियाँ मेरी' से)

Kirch se bharpoor saara gulsitaa'n ho jaaega
Jab kisi shiishe pe patthar meharbaa'n ho jaaega

Bijliyo'n ka naach tou dekhu'ngaa mai'n har haal me'n
Aur kya hai KHaak mera aashiyaa'n ho jaaegaa

Kya kashish rah jaaegii jaan-e-wafaa tuu hi bataa
Faislaa jo tere-mere darmiyaa'n ho jaaegaa

Jo hatheli par hai tere saamne sabke uchhaal
Is tarah qismat ka meri imtihaa'n ho jaaegaa

Tez lahre'n jab muhabbat se pukaare'ngee usey
Shartiyaa saahil se 'Manjhi' bad_gumaa'n ho jaaega

-Devender Manjhi

अब 'मजबूरियाँ मेरी' से..... 

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अब तक आप मेरे तीन ग़ज़ल-संग्रहों ('इशारे हवाओं के', 'समन्दर के दायरे' और 'क्यों सभी ख़ामोश हैं') की ग़ज़लें पढ़ रहे थे। अब प्रस्तुत हैं मेरे चौथे ग़ज़ल संग्रह 'मजबूरियाँ मेरी' की गज़लें।  यह संकलन वर्ष-1991 में 'भावना प्रकाशन, 126-पटपड़गंज, दिल्ली-110091' से प्रकाशित हुआ था और अपने पाठकों की काफ़ी वाह-वाही बटोरी थी। --देवेन्द्र माँझी
Ab 'majbooriyaa'n meri' se...

Ab tak aap mere teen ghazal-sa'ngraho'n (collections) ''ishaare hawaao'n ke'' , "samandar ke daayre" aur "kyo'n sabhi khaamosh hai'n" ki ghazale'n parh rahe the...
Ab prastut (pesh) hai'n mere chauthe (4th) ghazal sangrah "majbooriyaa'n meri" ki ghazle'n...yah sankalan (collection) varsh (saal)- 1991 me'n "Bhaavna Prakaashan, 126 - patpaRganj , Delhi -110091" se prakaashit (published) hu.aa tha aur apne paaTHako'n (parhnewaalo'n) ki kaafee waah-waahii baTorii thee...Devender Manjhi

’मजबूरियाँ मेरी’ शीर्षक ही क्यों ? 

अपनी इन ग़ज़लों  संकलन  क्या नाम दूँ --यह सवाल मुझे काफ़ी परेशान करता रहा। एक रंग,  मिज़ाज अथवा एक विषय-वस्तु  लेकर यदि इस संकलन की ग़ज़लें कही/ लिखी जातीं तो यक़ीनन इसके नामकरण में मुझको किसी विशेष परेशानी  साये से नहीं गुज़रना पड़ता मगर मेरे कवि-मन ने अपनी ग़ज़लों  मन्दिर के लिए विभिन्न विषय-वस्तुओं के पत्थरों  उठाकर अलग-अलग शे'र-रुपी देवताओं को तराशने व रंग-बिरंगे परिधानों से सजाने का प्रयास किया है।

Tuesday, October 13, 2015


230. ग़ुरबत हो लाख शान से रहने लगे हैं लोग 

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ग़ुरबत हो लाख शान से रहने लगे हैं लोग
बस्ती में आन-बान से रहने लगे हैं लोग

निकली है लाश जबसे बरहना ग़रीब की
अब दूर उस मकान से रहने लगे हैं लोग

बाज़ार-ए-हुस्न छुपने लगा भीड़-भाड़ में
मानूस हर दूकान से रहने लगे हैं लोग

झड़ते थे फूल जब भी कोई मा’रिका हुआ
महफ़िल में बदज़बान से रहने लगे हैं लोग

जो बौने-क़द थे 'माँझी' मचानों पे चढ़ गए
धरती पे आसमान से रहने लगे हैं लोग
                                     -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. ग़ुरबत=ग़रीबी, 2. बरहना=नग्न, नंगी, 3. बाज़ार-ए-हुस्न=सौन्दर्य का बाज़ार, 4. मानूस=प्रभावित, 5. मा’रिका=वाद-विवाद, बहस।

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Sunday, October 11, 2015



229.  रुक गई जाके खुली छत पे पवन आज की रात 

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रुक गई जाके खुली छत पे पवन आज की रात
किसी चन्दा को न लग जाए गहन आज की रात

लोग गलिओं से निकल आये हैं बाज़ारों में
बदला-बदला सा है अंदाज़े-कुहन आज की रात

बू-ए-गुल आई कहाँ से है ज़रा बतला दे
किसके आँगन में ये महका है चमन आज की रात

कौन याद आया है ख़्वाबों की हसीं वादी में
बढ़ गई और भी सीने में जलन आज की रात

छोड़ दे नाव ख़यालों के भँवर में 'माँझी'
वरना रह जायेगी बे-गोरो-कफ़न आज की रात
                                          -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--अंदाज़े-कुहन=पुराना ढंग, 2. बू-ए-गुल=फूल की ख़ुश्बू, 3.  बे-गोरो-कफ़न= बिना क़ब्र और कफ़न।


('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

228.   कैसा जज़्बा है मुहब्बत ये कभी समझाना 

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कैसा जज़्बा है मुहब्बत ये कभी समझाना
जब तुझे याद करूँ दिल से तो याद आ जाना

मेरी आँखों में बहारों का वो मंज़र ही नहीं
जैसे वीरान हो सदियों से कोई काशाना

मुद्दतें हो गईं इस दस्त में चलते-चलते
थक चुका हूँ मुझे मंज़िल पे कोई पहुँचाना

नीम-बिस्मिल तेरी यादों में तड़पते होंगे
उनका दरवाज़ा कभी रात गए खुलवाना

जिस तरह से भी चले नाव को चलने दीजे
तेरा 'माँझी' है समन्दर से अभी अनजाना
                                       -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. मंज़र=दृश्य, 2. काशाना=छोटा-सा घर, 3. मुद्दत=अरसा, 4. नीम-बिस्मिल=अर्द्ध-घायल।

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Kaisaa jazbaa hai muhabbat ye kabhi samjhaana 
Jab tujhe yaad karu'n dil se tou yaad aa jaana

 Meri aankho'n me'n bahaaro'n ka vo manzar hi nahi'n
 Jaise veeraan ho sadiyo'n se koi kaashaana

 Muddate'n ho gayi'n is dasht me'n chalte-chalte 
Thak chukaa hu'n mujhe manzil pe koi pahu'nchaana

 Neem-bismil teri yaado'n me'n taRRapte ho'nge
 Unkaa darwaaza kabhi raat gaye khulwaana 

 Jis tarah se bhi chale naav ko chalne deeje 
Tera 'Manjhi' hai samandar se abhi anjaana 
-Devendra Manjhi

Friday, October 9, 2015


227.  बीत गईं सब मिलन की घड़ियाँ पल-पल फैल गया 

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बीत गईं सब मिलन की घड़ियाँ पल-पल फैल गया
धूप का गोरी आँगन-आँगन आँचल फैल गया

रात गए अब कौन आएगा सेज पे जाके सो
नींद से बोझिल इन आँखों में काजल फैल गया

ढलते-ढलते पीली पड़ गई विरह की मारी शाम
जैसे जोगी के माथे पर संदल फैल गया

घायल हो गई रुत फूलों की अग्निबाण चले
गुलशन-गुलशन पतझड़ मारा जंगल फैल गया

नीलगगन को देखनेवाले 'माँझी' तट पे चल
आस का पंछी क्या लौटेगा बादल फैल गया
                                       देवेन्द्र माँझी



226. जब भी कोई तन्हाई में मुझसे मिलने आया था 

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जब भी कोई तन्हाई में हमसे मिलने आया था
आँखों से आँसू छलके थे, दिल जाने क्यों घबराया था

हमने जब सच्चाइयों की एक मशाल जलानी चाही
हमें पिलाने दोस्त हमारा ज़हर का प्याला लाया था

संसद के भीतर और बाहर एक विषय है चर्चा का
जिसने लूटा नैतिकता को कौन लुटेरा आया था

जब भी हमको वक़्त मिला था यारों की अज़माने का
हमने ख़ुद को कितना तन्हा, कितना बेबस पाया था

उलटी होते-होते बच गई 'माँझी' की टूटी कश्ती
क़िस्मत ही अच्छी थी वरना कैसा झटका खाया था
                                                     -देवेन्द्र माँझी



('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Jab bhi koi tanhaai me'n hamse milne aaya tha...
Aankho'n se aa'nsu chhalke the, dil jaane kyo'n ghabraaya tha...

Hamne jab sachchaaiyo'n ki ek mashaal jalaani chaahi...
Hame'n pilaane dost hamaara zahar ka pyaala laaya tha...

Sa'nsad* ke bheetar aur baahar ek wishay* hai charchaa ka...
Jisne lootaa naitiktaa* ko, kaun luteraa aaya tha

Jab bhi hamko waqt mila tha yaaro'n ko aazmaane ka...
Hamne khud ko kitna tanhaa, kitna bebas paaya tha...

Ultii hote-hote bach gayi 'Manjhi' ki TooTee kashtee...
Qismat hi acchhii thi varnaa kaisaa jhaTkaa khaaya tha...

-Devender Manjhi

Sansad = Parliament
Naitiktaa = Morality
Vishay = Subject



Thursday, October 8, 2015


225.  हाथ थामा है तो फिर हाथ झटकने से रहे 

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हाथ थामा है तो फिर हाथ झटकने से रहे
अब कभी दश्ते-तमन्ना में भटकने से रहे

वादी-ए-इश्क़ में क़ाबू में रखेंगे दिल को
फिर किसी चाह में हम उलटे लटकने से रहे

उनको इक बार सदा दे-के गुज़र जाते हैं
सर को हम संगे-दरे-नाज़ पटकने से रहे

जिनको बनना था चमन बादे-ख़िज़ाँ तेरे तुफ़ैल
अब बियाबानों में वो गुंचे चटकने से रहे

टूटकर तारे ख़लाओं में ही खो जाते हैं
गिर भी जाएँ तो दरख़्तों में अटकने से रहे

लाख वो प्यार को नफ़रत में बदल देते हैं
ख़ार बनकर के वो आँखों में खटकने से रहे
                                         देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. दश्ते-तमन्ना=मरुस्थल की चाहत, 2. वादी-ए-इश्क़=प्रेम की घाटी, 3. सदा =आवाज़, 4. संगे-दरे-नाज़=प्रेयसी के घर के दरवाज़े का पत्थर, 5. बादे-ख़िज़ाँ=पतझड़ की हवा, 6. तुफ़ैल =वास्ते, 7. ख़लाओं में=शून्य में।

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

224. मुझसे गर अंजुमने-नाज़ की रुस्वाई है 

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मुझसे गर अंजुमने-नाज़ की रुस्वाई है
मैं तमाशा हूँ तो फिर कौन तमाशाई है

वो इसी राह से गुज़रेगा लिये शम्अ़-ए-वफ़ा 
ये ख़बर शहर की आवारा हवा लाई है 

शौक़े-दीदार में आँखों को बिछा देता हूँ 
जब कभी पालकी सूरज की तरह आई है 

दिल धड़कता है सितारों के हसीं झुरमुट में 
यासो-उम्मीद में डूबी हुई तन्हाई है 

वो मेरा मुझसे पता पूछ रहा है हर रोज़ 
अजनबी शख़्स से इतनी-सी शनासाई है 

नाव बेख़ौफ़-ओ-ख़तर आगे बढ़ाओ 'माँझी'
हाथ, दो हाथ ही गर्दाब की गहराई है 
                                -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1.  अंजुमने-नाज़=नाज़-नखरों की महफ़िल यानी प्रेयसी की सभा, 2. शम्अ़-ए-वफ़ा=वफ़ा का दीप, 3. शौक़े-दीदार=दर्शन की अभिलाषा, 4. शनासाई=जान-पहचान, 5. बेख़ौफ़-ओ-ख़तर=निडर होकर। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Wednesday, October 7, 2015

223.   ज़मीं पे जाने मैं क्या सोचकर उतारा हूँ 

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ज़मीं पे जाने मैं क्या सोचकर उतारा हूँ 
अभी तो माथे के झूमर का इक सितारा हूँ   

मैं कितना टूटा हुआ हूँ तुझे नहीं मालूम 
तेरे बग़ैर मैं दुनिया में बेसहारा हूँ 

नसीमे-गुल मैं कई बार कह चुका तुझसे 
मुझे न छेड़ के मैं गर्दिशों का मारा हूँ 

ग़लत रहे हैं हमेशा तुम्हारे अंदाज़े 
मैं दोस्तों का नहीं दुश्मनों का प्यारा हूँ 

ज़माना है की मुझे नापसंद करता है 
ये ख़ुशनसीबी है मेरी तुझे गवारा हूँ 

लगा सका न किनारे पे कोई भी 'माँझी'
हरेक मौज ने तूफ़ान में उभारा हूँ 
                            -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. नसीमे-गुल=फूलों की सुगन्ध। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)





222.  दर्दे-फ़ुर्क़त ग़मे-हस्ती का कँवल महका है 

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दर्दे-फ़ुर्क़त ग़मे-हस्ती का कँवल महका है
आ भी जा तेरे लिए चाँद-महल महका है

हुस्न और इश्क़ के अशआर ढले जाते हैं
ऐ मुहब्बत तेरा अंदाज़े-ग़ज़ल महका है

बदली-बदली सी है टूटे हुए दिल की रंगत
शजर-ए-शौक़ तमन्नाओं का फल महका है

ये भी देखा है गुफाओं में जलाकर शम्मऐं
सारी दुनिया में तेरा तर्ज़े-अमल महका है 

लेनेवाला है कोई वक़्त का अवतार जन्म
मौज-दर-मौज ऐ गंगा तेरा जल महका है

कौन ये रेत के दरियाओं से गुज़रा 'माँझी'
दश्त को देखकर हर संगे-जबल महका है
                                       देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. दर्दे-फ़ुर्क़त=विरह की टीस, 2. ग़मे-हस्ती=दुःख भरा जीवन, 3. शजर-ए-शौक़=चाहत और इच्छाओं का वृक्ष, 4. तर्ज़े-अमल=काम का तरीक़ा, 5. दश्त=जंगल, 6. संगे-जबल=पहाड़ का पत्थर।

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)




Tuesday, October 6, 2015

221. अकेला मैं ही न था इस दयार में शामिल 

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अकेला मैं ही न था इस दयार में शामिल
शबे-फ़िराक़ भी थी इन्तिज़ार में शामिल

हवा के ख़ौफ़ से मैंने कफ़न जो पहना था
बिख़र के हो गया चढ़ते ग़ुबार में शामिल

मुझे मलाल नहीं तेरी बेवफ़ाई का
ख़ुलूस कम था मेरा तेरे प्यार में शामिल

वो शख़्स कौन-से ग़म में कराहता ही रहा
हुआ न जश्ने-गुले-नौबहार में शामिल

ये देखते ही वो तूफ़ान टल गया 'माँझी'
नदी की धार थी सागर की धार में शामिल
                                   -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. दयार=घर, घेर, २. शबे-फ़िराक़=विरह-रात्रि, 3. जश्ने-गुले-नौबहार=नई बहार का उत्सव।

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)