233 कैसी है ये धक्कमपेल
कैसी है ये धक्कमपेल
निकला जाता सबका तेल
जब सबकी पौबारह है
तू भी भैया खुलकर खेल
कहने की तू माने ना
आन पड़ी है सर पर झेल
हम सब सिर्फ़ मुसाफ़िर हैं
दुनिया है इक चलती रेल
'माँझी' की तू चाल समझ
लहरों से करता है मेल
-देवेन्द्र माँझी
('मजबूरियाँ मेरी' से)
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