Sunday, October 18, 2015

233  कैसी है ये धक्कमपेल 


कैसी है ये धक्कमपेल
निकला जाता सबका तेल

जब सबकी पौबारह है
तू भी भैया खुलकर खेल

कहने की तू माने ना
आन पड़ी है सर पर झेल

हम सब सिर्फ़ मुसाफ़िर हैं
दुनिया है इक चलती रेल

'माँझी' की तू चाल समझ
लहरों से करता है मेल
                 -देवेन्द्र माँझी

('मजबूरियाँ मेरी' से)

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