224. मुझसे गर अंजुमने-नाज़ की रुस्वाई है
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मुझसे गर अंजुमने-नाज़ की रुस्वाई है
मैं तमाशा हूँ तो फिर कौन तमाशाई है
वो इसी राह से गुज़रेगा लिये शम्अ़-ए-वफ़ा
ये ख़बर शहर की आवारा हवा लाई है
शौक़े-दीदार में आँखों को बिछा देता हूँ
जब कभी पालकी सूरज की तरह आई है
दिल धड़कता है सितारों के हसीं झुरमुट में
यासो-उम्मीद में डूबी हुई तन्हाई है
वो मेरा मुझसे पता पूछ रहा है हर रोज़
अजनबी शख़्स से इतनी-सी शनासाई है
नाव बेख़ौफ़-ओ-ख़तर आगे बढ़ाओ 'माँझी'
हाथ, दो हाथ ही गर्दाब की गहराई है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. अंजुमने-नाज़=नाज़-नखरों की महफ़िल यानी प्रेयसी की सभा, 2. शम्अ़-ए-वफ़ा=वफ़ा का दीप, 3. शौक़े-दीदार=दर्शन की अभिलाषा, 4. शनासाई=जान-पहचान, 5. बेख़ौफ़-ओ-ख़तर=निडर होकर।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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