Thursday, October 8, 2015

224. मुझसे गर अंजुमने-नाज़ की रुस्वाई है 

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मुझसे गर अंजुमने-नाज़ की रुस्वाई है
मैं तमाशा हूँ तो फिर कौन तमाशाई है

वो इसी राह से गुज़रेगा लिये शम्अ़-ए-वफ़ा 
ये ख़बर शहर की आवारा हवा लाई है 

शौक़े-दीदार में आँखों को बिछा देता हूँ 
जब कभी पालकी सूरज की तरह आई है 

दिल धड़कता है सितारों के हसीं झुरमुट में 
यासो-उम्मीद में डूबी हुई तन्हाई है 

वो मेरा मुझसे पता पूछ रहा है हर रोज़ 
अजनबी शख़्स से इतनी-सी शनासाई है 

नाव बेख़ौफ़-ओ-ख़तर आगे बढ़ाओ 'माँझी'
हाथ, दो हाथ ही गर्दाब की गहराई है 
                                -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1.  अंजुमने-नाज़=नाज़-नखरों की महफ़िल यानी प्रेयसी की सभा, 2. शम्अ़-ए-वफ़ा=वफ़ा का दीप, 3. शौक़े-दीदार=दर्शन की अभिलाषा, 4. शनासाई=जान-पहचान, 5. बेख़ौफ़-ओ-ख़तर=निडर होकर। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

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