Wednesday, September 30, 2015


220.  ये किसके हुस्न का चर्चा तेरी ज़बान पे है 

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ये किसके हुस्न का चर्चा तेरी ज़बान पे है 
ज़मीं पे है कि वो शख़्स आसमान पे है 

हदफ़ बनाया था तूने ही जानकर मुझको 
निशान तीर का अब तक तेरी कमान  है 

न मुझसे पूछ तू अंजाम इस मुहब्बत का 
मदार अच्छे-बुरे का तेरे गुमान पे है 

उठाये फिरता हूँ मय्यत जो आज इन्सां की 
ये बोझ मेरे ही सर पर नहीं जहान पे है 

ये कैसे कह दिया 'माँझी' मचलती लहरों ने 
कभी न बरसेगा वो अब्र जो उड़ान पे है 
                                  -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. हदफ़=निशाना, 2. मदार=दारोमदार, 3. मय्यत=लाश, 4. अब्र=बादल। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Ye kiske husn ka charchaa teri zabaan pe hai 
Zamii'n pe hai ki vo shakhs aasmaan pe hai 

Hadaf banaaya tha tuune hi jaan kar mujh ko 
Nishaan teer ka ab tak teri kamaan hai 

 Na mujhse puuchh tuu anjaam is muhabbat ka 
Madaar acchhe-bure ka tere gumaan pe hai 

UThaaye phirtaa hu'n mayyat jo aaj insaa'n ki 
Ye bojh mere hi sar par nahi'n jahaan pe hai 

Ye kaise kah diya 'Manjhi' machaltii lahro'n ne 
Kabhi na barsegaa vo abr jo uDaan pe hai

 219.  दिन निकलते ही अँधेरा मेरे घर में हो गया 

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 दिन निकलते ही अँधेरा मेरे घर में हो गया 
आँख में सूरज के कोई कैसा काँटा बो गया 

जिसका डर था दोस्तो लो वो ही सब कुछ हो गया 
एक बूढ़ा आदमी सूनी सड़क पर सो गया 

याद के बिस्तर पे पड़ती जा रही हैं सिलवटें 
कौन तन्हाई में मेरे साथ आकर सो गया 

है नहीं आसान यारो फलसफों को खोलना 
लौटकर आया नहीं अन्धे सफ़र में जो गया 

सिरफिरी मौजों ने साहिल पर किसी से सुन लिया 
दर्दो-ग़म का अब बदलकर नाम 'माँझी' हो गया 
                                           -देवेन्द्र माँझी 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)


Din nikalte hi andheraa mere ghar mein ho gayaa

Aankh mein sooraj ke koi kaisaa kaantaa bo gayaa

Jiska Dar tha dosto lo vo hi sab kuchh ho gayaa
Ek buDHaa aadmi sooni saDak par so gayaa

Yaad ke bistar pe paDti jaa rahi hai'n silvate'n
Kaun tanhaaii mein mere saath aakar so gayaa

Hai nahi'n aasaan yaaro falsafo'n ko kholnaa
Laut kar aaya nahi'n andhe safar mein jo gaya

Sir.phirii maujo'n ne saahil par kisi se sun liyaa
Dard-o-gham ka ab badalkar naam 'Manjhi' ho gayaa

-Devendra Manjhi

 218. ज़िन्दगी कुछ भी हो ये आज बताना है मुझे 

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ज़िन्दगी कुछ भी हो ये आज बताना है मुझे 
कौन-सा क़र्ज़ है वो जिसको चुकाना  मुझे 

आँधियाँ आके दो-राहे पे खड़ी हो जाएँ 
इक नया दीप सरे-राह जलाना है मुझे 

शीश-महलों की चमक देखके तेरी ख़ातिर 
संग-रेज़ों से ख़राबे को सजाना है मुझे 

देखता क्या है तू मुड़-मुड़के तेरा साया हूँ 
साथ आया हूँ तो फिर साथ ही जाना है मुझे 

जब ये महिवाल है सोहनी का दीवाना 'मांझी'
फिर तो ये कच्चा घड़ा पार लगाना  मुझे 
                                       -देवेन्द्र माँझी          

शब्दार्थ--1. संग-रेज़ों से=पत्थर के टुकड़ों से, 2. ख़राबे को=बर्बाद घर को, खण्डहर को। 
                                   

Tuesday, September 29, 2015


 217.  दीवाना चुप रहा मैं उसे बोलता रहा 

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दीवाना चुप रहा मैं उसे बोलता रहा 
वो कौन-सी गिरह थी जिसे खोलता रहा 

तन्हाइयों की क़ैद में तन्हाई के सबब 
साया-सा मेरे चारों तरफ़ डोलता रहा 

उतरा नहीं किसी भी शजर पर वो आज तक 
पंछी जो इक फ़ज़ाओं में पर तोलता रहा 

बूढ़ा फ़क़ीर जाने उसे दे गया था क्या 
इक ज़हर-सा जवानिओं में घोलता रहा 

मौजों ने जब भी बंद लगाया नदी-नदी 
पतवार लेके 'मांझी' उन्हें खोलता रहा 
                                   - देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. गिरह=गाँठ, 2. शजर=पेड़, वृक्ष, 3. फ़ज़ाओं में=वातावरण में, 4. मौजों ने=लहरों ने।

Deevaana chup rahaa mai'n usey boltaa rahaa
Vo kaun-si girah thi jisey kholtaa rahaa

Tanhaaiyo'n ki qaid me'n tanhaai ke sabab
Saaya-sa mere charo'n taraf doltaa rahaa

Utraa nahi'n kisi bhi shajar par vo aaj tak
Panchhee jo ik fazaao'n me'n par toltaa rahaa

BuDHaa faqeer jaane usey de gayaa tha kyaa
Ik zahar-saa javaaniyo'n mein gholtaa rahaa

Maujo'n ne jab bhi band lagaaya nadee-nadee
Patvaar leke 'Manjhi' unhe'n kholtaa rahaa

-Devendra Manjhi

Mamjhi ki Shayari


 74.    होंठ बेशक बन्द हैं, बेशक ज़बाँ है चुप

                           होंठ बेशक बन्द हैं, बेशक ज़बाँ है चुप 
                           बोलती हैं आँख जिसकी वो कहाँ है चुप

                           सोचकर शायद यही सारा जहाँ है चुप 
                           वो सुख़नवर है बड़ा जिसकी ज़बाँ है चुप 

                          उसके दोनों पहलुओं का ये नज़ारा है 
                          तीर खेले खेल अपना और

Monday, September 28, 2015


 216. मेरे  लिखे हुए को किताबों में देखना 


मेरे  लिखे हुए को किताबों में देखना 
आइन्दा फिर कभी मुझे ख़्वाबों में देखना 

आ जाएँगे वो आईने में खुलके सामने 
गुज़रे हुए समय को निक़ाबों में देखना 

आये अगर न बाज़ मुहब्बत के खेल से 
उनका भी हश्र खाना-ख़राबों में देखना 

मासूम भोली-भाली सी कलिओं की मस्तियाँ 
जब ये जवान हो तो हिजाबों में देखना 

साहिल पे अब नज़र नहीं आएँगे फिर कभी 
'माँझी' अब उनका नाम हुबाबों में देखना 
                                      -देवेन्द्र माँझी 

-शब्दार्थ--1. निक़ाबों में=परदे में, घूँघट में, 2. हश्र=परिणाम, 3. हिजाबों में=पर्दों में, 4. हुबाबों में=बुलबुलों में। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)


 215. दिखला के झलक शहर को वीरान करोगे 


दिखला के झलक शहर को वीरान करोगे
तुम मुफ़्त में लोगों को परेशान करोगे 

दीवाना बनाकर मुझे पहुँचा दिया घर-घर 
इससे भी बड़ा और क्या एहसान करोगे 

वो वक़्त भी आएगा कभी ख़ल्वत-ए-शब में 
आईने को आईने से हैरान करोगे 

जब आनके बैठेगा यहाँ हुस्ने-जहाँताब 
इस बज़्म में सब चाक गरिबान करोगे 

'माँझी' न पहुँच पाएगी साहिल पे ये कश्ती 
लहरों को अगर शामिल-ए-तूफ़ान करोगे 
                                        -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. ख़ल्वत-ए-शब में =रात की तन्हाई में, एकान्त में, 2. हुस्ने-जहाँताब=ऐसा सुन्दर जिसकी दुनिया में बराबरी न हो, 3. बज़्म=महफ़िल, 4. चाक गरिबान=फटा गिरेबान। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Dikhlaa ke jhalak shahar ko veeraan karoge Tum muft me'n logo'n ko pareshaan karoge Deevaana banaakar mujhe pahu'nchaa diyaa ghar-ghar Is se bhi baRaa aur kya ehsaan karoge Vo waqt bhi aa.ega kabhi KHalwat-e-shab me'n Aaiine ko Aaiine se hairaan karoge Jab aan ke baiTHegaa yahaa'n husn-e-jahaa'n.taab Is bazm me'n sab chaak garebaan karoge 'Manjhi' na pahu'nch paaegii saahil pe ye kashtii Lahro'n ko agar shaamil-e-toofaan karoge -Devendra Maanjhi 1. KHalwat-e-shab me'n = Raat ki tanhaai me'n, Ekaa'nt me'n 2. Husn-e-jahaa'n.taab = Aisaa sundar jiskii duniya me'n baraabarii na ho 3. Bazm = Mahfil 4. Chaak Garebaan = Phataa Girebaan

Thursday, September 24, 2015


  214. बेसबब उनसे प्यार कैसे हुआ 


बेसबब उनसे प्यार कैसे हुआ
दिल ये बे-इख़्तियार कैसे हुआ 

मुझको जोश-ओ जुनूँ में क्या मालूम 
पैरहन तार-तार कैसे हुआ 

क्या बताएं तुम्हें ज़मीं वालो 
आस्माँ अश्कबार कैसे हुआ 

जिसमें पतझड़ क़याम करता था 
वो चमन लालाज़ार कैसे हुआ 

एक लम्हा भी किस क़दर था गराँ 
हमसे ये इन्तिज़ार कैसे हुआ 

घर से तन्हा निकालकर मुझको 
शहर ये सोगवार कैसे हुआ 

नाव मँझधार में थी जब 'माँझी' 
इस समन्दर से पार कैसे हुआ 
                              -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. बे-इख़्तियार=बेक़ाबू, 2. जोश-ओ जुनूँ=दीवानगी, 3. पैरहन=लिबास, 4. अश्कबार=आँसू , 5. क़याम=निवास, 6. चमन=बाग, 7. लालाज़ार=हरा-भरा, 8. गराँ =भारी, 9. सोगवार=मातम मनानेवाला। 

Wednesday, September 23, 2015


  213.  उसके पाँवों में बँधी ज़ंजीर है 


                   उसके पाँवों में बँधी ज़ंजीर है 
                   उस दीवाने की यही तक़दीर है 

                   ज़िन्दगी क्या है कोई समझाए तो 
                   ये समस्या भी बड़ी गम्भीर है 

                   डर रहा इन्सान अब इन्सान से 
                   ये ही मेरे देश की तस्वीर है 

                  मेरे हृदय में अभी तक मुस्तक़िल 
                  दर्द की पोशीदा इक जागीर है 

                  धुँधली-धुँधली देखते हो तुम जिसे 
                  ये पुराने ख़्वाब की ताबीर है 

                  देखकर दुश्मन भी शर्मिन्दा हुआ 
                  ज़हर में तिर्याक़ की तासीर है 

                   डूब जायेगी तुम्हारी नाव भी 
                  किस क़दर आँखों में 'माँझी' नीर है 
                                                -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. मुस्तक़िल=स्थाई तौर पर, 2. पोशीदा=छिपी हुई, 3. ताबीर=स्वप्न की विवेचना, 4. तिर्याक़ =विषहर, जिससे विष का असर कम किया जाता है।

Uske paa'nvo'n me'n ba'ndhii zanjeer hai Us deevaane ki yahi taqdiir hai Zindagi kya hai koi samjhaaye to Ye samasyaa bhi baDii gambheer hai Dar rahaa insaan ab insaan se Ye hi mere desh ki tasveer hai Mere hriday me'n abhi tak mustaqil Dard ki posheeda ik jaageer hai Dhundhalii-Dhundhalii dekhte ho tum jise Ye puraane khwaab ki taabeer hai Dekhkar dushman bhi sharmindaa huaa Zahar me'n tiryaaq ki taaseer hai Duub jaayegii tumhaari naav bhi Kis qadar aankho'n me'n 'Manjhi' neer hai -Devendra Manjhi 1. Mustaqil = sthaayii taur par 2. poshiidaa = chhipii huii 3. Taabeer = swapn ki vivechanaa 4. Tiryaaq = vishhar, jis se vish ka asar kam kiyaa jaata hai
                   
                 
                

Tuesday, September 22, 2015


 212.  कैसी हो जाती है गलिओं की फ़ज़ा रात गए 

                   कैसी हो जाती है गलिओं की फ़ज़ा रात गए 
                   ओढ़ लेती है कराहों की रिदा रात गए 

                    चौंक उठता हूँ मैं ये देखके मंज़र सारे 
                    किसने खोली है दरीचे में क़बा रात गए 

                    आओ, हम सब चलें उस जिंस का सौदा करने 
                    आज महकेगी सरे-बज़्म हिना रात गए

                    वो तो इक याद का पैकर था जो भूले-भटके 
                    मुझको देता रहा रुक-रुक के सदा रात गए

                    क्या कोई चाँद चला आया नहाने 'माँझी'
                    हो चली मस्त क्यों लहरों की अदा रात गए
                                                          -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. रिदा=चादर, 2. मंज़र=दृश्य, 3. दरीचे=झरोखे, 4. जिंस=सामान, 5. सरे-बज़्म=भरी महफ़िल में, 6. हिना=मेंहदी। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)


Kaisi ho jaati hai galiyo'n ki fazaa raat gaye

ODH leti hai karaaho'n ki ridaa raat gaye

Chau'nk uTHtaa hu'n mai'n ye dekh ke manzar saare
Kisne kholi hai dariiche mein qabaa raat gaye

Aao ham sab chale'n us ji'ns ka saudaa karne
Aaj mahkegi sar-e-bazm hina raat gaye

Vo to ik yaad ka paikar tha jo bhule-bhatke
Mujhko detaa rahaa ruk-ruk ke sadaa raat gaye

Kyaa koi chaa'nd chalaa aayaa nahaane 'Manjhi'
Ho chali mast kyo'n lahro'n ki adaa raat gaye

-Devendra Manjhi

1. Ridaa = Chaadar
2. Manzar = Drishya
3. Dariiche = Jharokhe
4. Jins = Saamaan
5. Sar-e-bazm = Bhari Mehfil me'n
6. Hina = Me'nhdee

 211.  सन्नाटा पिछली रात को रोता है शहर में 


                                सन्नाटा पिछली रात को रोता है शहर में 
                                क्यों रोज़-रोज़ हादिसा होता है शहर में 

                                 आएगा इन्क़िलाब यहाँ कैसे तुम कहो 
                                 सोचों का कुम्करण अभी सोता है शहर में 

                                 बारूद की सुरंग वो बिछाकर चला गया 
                                 हाथों से अपने आग जो ढोता है शहर में 

                                 नाज़ुक समझ रहे हैं जिसे फूल-सा सभी 
                                नश्तर वो एक शख़्स चुबोता है शहर में 

                               दरिया को पार अब भला कैसे करेंगे हम 
                               'माँझी' ही लाके नाव डुबोता है शहर में  
                                                                    -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. कुम्करण=कुम्भकरण। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

                                

Monday, September 21, 2015


 

 210.  चिराग़ किसका बुझा रात के अँधेरे में 


                         चिराग़ किसका बुझा रात के अँधेरे में 
                         धुआँ कहाँ से उठा रात के अँधेरे में 

                         मुझे तो दश्त में कोई नज़र नहीं आता 
                         ये किसने दी है सदा रात के अँधेरे में 

                         तेरी तलब में सरे-राह इक दीया बनके 
                         तमाम उम्र जला रात के अँधेरे में 

                         पता नहीं कोई मुझको कहाँ तलाश करूँ 
                         वो किस जगह पे छिपा रात के अँधेरे में 

                          जलाके याद की शम्अ़यें क़दम-क़दम मैंने 
                          सफ़र तमाम किया रात के अँधेरे में 

                          सफ़ीना दूर किनारे से रह गया 'माँझी'
                          चली कुछ ऐसी हवा रात के अँधेरे में 
                                                         -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. दश्त=जंगल, 2. तलब=चाहत। 

('क्यों  ख़ामोश हैं' से)


 209.  रूठनेवाले को घर जाके मनाना होगा 


                     रूठने वाले को घर जा के मनाना होगा 
                     दर्द दिल में है तो फिर ज़ख़्म छिपाना होगा 

                     हिज्र की रात में आवाज़ मैं दूँगा तुझको 
                     गर मुहब्बत  हर हाल में आना होगा 

                    उन घरौंदों में अँधेरों का बसेरा है जहाँ 
                    शाम होते ही चराग़ों को जलाना होगा 

                     गर्दिशे-वक़्त तेरे साथ ये मालूम न था 
                     आसमानों का मुझे बोझ उठाना होगा 

                     वो परी-चेहरा जो आ जाए चमनज़ारों में 
                     उनकी ज़ुल्फ़ों में गुलाबों को सजाना होगा 

                      सोते पानी में कहाँ नाव चलेगी 'माँझी'
                      अपनी पतवार से लहरों को जगाना होगा 
                                                            -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. हिज्र=विरह, जुदाई, वियोग, 2. गर्दिशे-वक़्त=बुरा समय, परेशानियों भरा समय, 3. परी-चेहरा=परी या हूर की तरह सुन्दर चेहरेवाली, 4. चमनज़ारों=उपवनों में, बाग़ों में। 

Sunday, September 20, 2015


 208.  भीड़ को राह से हटाओ तो 


                   भीड़ को राह से हटाओ तो 
                   क्या हुआ हादिसा बताओ तो 

                   कैसे कह दूँ कि आप हैं मेरे 
                    पहले अपना मुझे बनाओ तो 

                   मैं भी अपना दीया जलाता हूँ 
                   चाँद को तुम यहाँ बुलाओ तो 

                   हैं जो बेज़ार अपनी सूरत से 
                   उनको फिर आईना दिखाओ तो 

                  हम अँधेरे नहीं जो मिट जाएँ 
                  रौशनी में दीया जलाओ तो 

                  आह-ओ-ज़ारी में कुछ नहीं 'माँझी'
                  कोई रंगीं ग़ज़ल सुनाओ तो 
                                            -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. बेज़ार=खिन्न, 2. आह-ओ-ज़ारी=रोना-धोना।

BheeRR ko raah se hataao to
Kya hu.aa haadisa bataao to

Kaise kah du'n ki aap hai'n mere
Pahle apna mujhe banaao to

Mai'n bhi apna diya jalaata hu'n
Chaa'nd ko tum yahaa'n bolaao to

Hai'n jo bezaar apni surat se
Unko phir aainaa dikaao to

Ham andhere nahi'n jo miT jaa.e'n
Raushani me'n diya jalaao to

Aah-o-zaari me'n kuchh nahi'n 'Manjhi'
Koi ra'ngee'n ghazal sunaao to

1. Bezaar = Khinn
2. Aah-o-zaari = ronaa-dhonaa

  207.  ऐसे आँखों में धुँधलके छा गए 


                           ऐसे आँखों में धुँधलके छा गए
                           सामने मंज़िल के धोखा खा गए 

                           ग़ैर पर नज़रे-इनायत देखकर 
                           हम तेरी महफ़िल से उठकर आ गए 

                           किसलिए ये ग़म की बदली छा गई 
                           फूल क्यों बादे-सबा मुरझा गए 

                           बेनियाज़ी का हमें कुछ डर नहीं 
                           लोग अब तो तेरी आदत पा गए 

                            उनसे मिलना भी क़यामत हो गया 
                            सैकड़ों इल्ज़ाम सर पर आ गए 

                            जाके किससे हाले-दिल 'माँझी' कहे 
                             ज़ख़्म सीनों के वो सब दिखला गए 
                                                              -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. नज़रे-इनायत=मेहरबानी, 2. बादे-सबा=प्रात:कालीन ख़ुशबू भरी मोहक हवा, समीर, 3. बेनियाज़ी=उपेक्षा, 4. हाले-दिल=दिल का हाल। 
                                                             
                                                         
                                                               

Friday, September 18, 2015


 206.  स्याह परदे में छुप गया कोई 


                     स्याह परदे में छुप गया कोई 
                     ये सितमपेशा बेवफ़ा है कोई 

                     सूने-सूने हैं कूचा-ओ-बाज़ार 
                     शहर में हादिसा हुआ है कोई 

                      लोग मिलने से जी चुराते हैं 
                      दोस्तों की ये बददुआ है कोई 

                     मुन्तज़िर शाम के धुँधलके में 
                     टिमटिमाता हुआ दीया है कोई 

                     बूढ़े बरगद की छाँव में शायद 
                     काफ़िला दर्द का रुका है कोई 

                    नाव साहिल पे लेके चल 'माँझी'
                    पीछे तूफ़ान आ रहा है कोई 
                                             -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. सितमपेशा=अत्याचार करनेवाला, ज़ुल्म ढानेवाला, 2. बेवफ़ा=अकृतज्ञ, 3. कूचा-ओ-बाज़ार=बाज़ार और गालियाँ, 4. मुन्तज़िर=प्रतीक्षारत। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

                   
 

 205.  देखें क्या शहरे-आरज़ू चलके 


                    देखें क्या शहरे-आरज़ू चल के
                    हो गए राख सारे घर जल के 

                    ढूँढ़ते हो चिराग़ लेकर क्या 
                    चाँद पहुँचा गुफाओं में ढल के 

                     दास्ताँ दर्द की सुनाने को 
                     रह गए आज भी खंडर कल के 

                    कोई दीवाना इल्तिजा लेकर 
                    धूल आया है जिस्म पर मल के 

                    जब भी सूरज ज़वाल पर आया 
                    दूर तक पहुँचे साये पीपल के 

                    नाव भी डगमगा गई 'माँझी'
                    मेरी आँखों से अश्क जब छलके 
                                                     -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. शहरे-आरज़ू=इच्छाओं का नगर, 2. खंडर=खण्डहर, 3. इल्तिजा=प्रार्थना, 4. ज़वाल=गिराव, ढलाव। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

                    

Thursday, September 17, 2015


 204.   धूप से साफ़ करके आँगन को 


                         धूप से साफ़ करके आँगन को
                          हमने बाँधा है आज सावन को 

                          उजड़ा-उजड़ा है रंग महफ़िल का 
                          आग किसने लगा दी गुलशन को 

                          मेरी उलझन अजीब उलझन है 
                          कोई सुलझा सका न उलझन को 

                          रोककर के वो साँस को अपनी 
                          सुन रहा है ज़मीं की धड़कन को 

                           लेके पतवार हाथ में 'माँझी'
                           चीरता है भँवर के चिलमन को 
                                                    -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. चिलमन=घूँघट। 

(' सभी ख़ामोश हैं' से)

                           

 203.  वो तअ़क़्क़ुब में था लुटा कैसे 


                      वो तअ़क़्क़ुब में था लुटा कैसे 
                      पीछे मुड़कर मैं देखता कैसे 

                      तेरे बीमार ने शिफ़ा पाई 
                      अब करेगी असर दवा कैसे 

                      बढ़ गया इतना शाम होते ही 
                      तेरी ज़ुल्फ़ों का सिलसिला कैसे 

                      इन ख़ुदाओं के दरम्याँ रहकर 
                      कोई माँगेगा अब दुआ़ कैसे 

                      'माँझी' सोया हुआ है दरिया में 
                      मौज दिखलाये अब अदा कैसे 
                                                 -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. तअ़क़्क़ुब=पीछा करता हुआ, 2. शिफ़ा=रोगमुक्ति, 3.मौज=लहर। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से) 

202.   ऐसा भी काम दोस्तो करना पड़ा मुझे 


                        ऐसा भी काम दोस्तो करना पड़ा मुझे 
                        बदनाम उस शहर से गुज़रना पड़ा मुझे 

                        मेरी वजह  से लोग ये सारे उदास हैं 
                        क़िस्तों में इस ख़याल से मरना पड़ा मुझे 

                        जब भी लिखे थे ख़त किसी सूरज के नाम पर 
                         अन्धे दीये की लौ में उतरना पड़ा मुझे 

                         देखे गए न छाँव में ठिठुरे हुए बदन 
                         आँगन तमाम धूप से भरना पड़ा मुझे 

                        आसाँ नहीं था नाव को तूफाँ से खींचना 
                        'माँझी' सिमट-सिमट के बिखरना पड़ा मुझे 
                                                               -देवेन्द्र माँझी 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)   

 201.  मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया 


                             मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया 
                             दुश्मनों को भी पसीना आ गया 

                              अब न ढूँढ़ेंगे रफ़ूगर शहर में 
                              ऐ मुहब्बत चाक सीना आ गया 

                              साक़िया ये साग़रो-मीना उठा 
                              मुझको पीने का क़रीना आ गया 

                              मुझको तो एक बूँद पानी है गराँ 
                              तुझको कैसे ज़हर पीना आ गया 

                              आँख ही उस वक़्त 'माँझी' की खुली 
                              जब किनारे पर सफ़ीना आ गया 
                                                              -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. गराँ =तीखि. कडुवी। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Friday, September 11, 2015


 200.   इक नया फूल खिलाया जाए 


                           इक नया फूल खिलाया जाए
                           फिर कहीं दिल को लगाया जाए 

                           सो गए हैं जो लहद में जाकर 
                           उनको फिर होश में लाया जाए 

                           दोस्त से प्यारा है दुश्मन अपना 
                           सोचकर हाथ मिलाया जाए 

                            सारे सुकरात नज़र आते हैं 
                            ज़हर किस-किसको पिलाया जाए 

                            कितनी तारिक-फ़ज़ा है 'माँझी'
                            चाँद दरिया में उगाया जाए 
                                                           -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. लहद=क़ब्र, समाधि, 2. तारिक-फ़ज़ा=तिमिर वातावरण, अँधेरा। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
                           




  199.  रात माना बड़ी सुहानी है 


                   रात माना बड़ी सुहानी है 
                   यादे-माज़ी की इक निशानी है 

                   जानता हूँ तेरा ख़फ़ा होना 
                   जानेमन ये अदा पुरानी है 

                    इसपे क्यों एतिबार कर बैठे 
                    ये हक़ीक़त नहीं कहानी है 

                    महविशों में है महताब वही 
                    देखने में जो पानी-पानी है 

                     शोर में नाव रोक मत 'माँझी'
                     चढ़ते दरिया की ये रवानी है 
                                               -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. यादे-माज़ी=बीते समय की याद, भूतकाल की याद, 2. महविशों=तारे. सितारे, 3. महताब=चाँद। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Thursday, September 10, 2015


 198.  जाने क्या गुल ये खिलाएगी हवा कोठे की 


                            जाने क्या गुल ये खिलाएगी हवा कोठे की 
                            लेके उतरा है कोई शख़्स दुआ कोठे की 

                            दिल के कमज़ोर हैं घिस-घिसके कसौटी पे ना देख 
                            अपनी बर्दाश्त से बाहर है जफ़ा कोठे की 

                            अधखिली कलियों के जिस्मों का तहफ़्फ़ुज़ कर लो 
                            चाँदनी बनके सरों पे है रिदा कोठे की 

                             और निखरेगी अभी आख़िरे-शब आने दो 
                             साज़-ओ-आवाज़ के संगम में फ़ज़ा कोठे की 

                             बारहा गुज़रे हैं उस अन्धी गली से 'माँझी'
                             दिल की गहराई में उतरी ना अदा कोठे की 
                                                                      -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. तहफ़्फ़ुज़=सुरक्षा, 2. रिदा=चादर।

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Jaane kya gul ye khilaaegi hawaa koThe ki
Leke utraa hai koi shakhs du.aa koThe ki

Dil ke kamzor hai'n ghis-ghis ke kasauTii pe naa dekh
Apnii bardaasht se baahar hai jafaa koThe ki

Adhkhilee kaliyo'n ke jismo'n ka tahaffuz kar lo
Chaa'ndnee ban ke saro'n pe hai ridaa koThe ki

Aur nikharegi abhi aakhir-e-shab aane do
Saaz-o-aawaaz ke sangam me'n fazaa koThe ki

Baarhaa guzre hai'n us andhii galii se 'Manjhi'
Dil ki gahraa.ii me'n utrii naa adaa koThe ki

1. Tahaffuz = surakxaa
2. Ridaa = Chaadar


 197.  जानता हूँ कि तू गुज़रेगी सबा मेरे बाद 


                       जानता हूँ कि तू गुज़रेगी सबा मेरे बाद 
                       क्या हुआ फूल गुलिस्ताँ में खिला मेरे बाद 

                       एक दिन ऐसा भी आएगा भरी महफ़िल में 
                       होगा महताब कोई जलवानुमा मेरे बाद 

                        ज़िन्दगी ज़हर-सी लगती है ये तन्हाई में 
                        क्या ही अच्छा था कि तुम होते ख़फ़ा मेरे बाद 

                        दर्दे-दिल अब न सुनेगा कोई आवाज़ तेरी 
                        लोग बाज़ार से लाएँगे दवा मेरे बाद 

                        जल्द कश्ती को किनारे से लगा ले "माँझी'
                        और आएँगे ये तूफ़ानो-बला मेरे बाद 
                                                            -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. समीर, प्रात:काल की ख़ुशबू-भरी हवा, 2. महताब=चाँद, 3. जलवानुमा=दृष्टिगोचर, 4. तूफ़ानो-बला=भयंकर तूफ़ान। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Wednesday, September 9, 2015


196.   प्यार के नाम को बदनाम न होने देना 


                           प्यार के नाम को बदनाम न होने देना
                           जज़्बए-इश्क़ को नाकाम न होने देना 

                          इन दवाओं से तो बढ़ जाएगी बेताबिये-दिल 
                          तुम मेरे दर्द को आराम न होने देना 

                         चढ़ते सूरज को दिखाकर ये हज़ारों शम्अ़एं
                         शाम से पहले कभी शाम न होने देना 

                         वो अगर रक्खें जवानी की बहारों में क़दम 
                         ऐसे आग़ाज़ का अन्जाम न होने देना 

                         इस अजूबे को अभी नाव में रखना 'माँझी'
                         सुपुर्दे-गर्दिशे-अय्याम न होने देना 
                                                            -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. जज़्बए-इश्क़=प्रेम-भावना, 2. बेताबिये-दिल=दिल की बेचैनी, 3. आग़ाज़=प्रारम्भ, शुरूआत, 4. अन्जाम=अन्त, 5. सुपुर्दे-गर्दिशे-अय्याम=बुरे दिनों के हवाले। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)

Pyaar ke naam ko badnaam na hone dena
Jazba-e-ishq ko naakaam na hone dena

In dawaao'n se to baDH jaaegi betaabi-e-dil
Tum mere dard ko aaraam na hone dena

ChaRHte sooraj ko dikhaakar ye hazaaro'n sham'ae'n
Shaam se pahle kabhi shaam na hone dena

Vo agar rakkhe'n javaanii ki bahaaro'n me'n qadam
Aise aaghaaz ka anjaam na hone dena

Is ajoobe ko abhi naav me'n rakhnaa 'Manjhi'
Supurd-e-gardish-e-ayyaam na hone dena

-Devendra Manjhi


195. देख ले जी भरके ऐ जाने-तमन्ना प्यार से 


                         देख ले जी भरके ऐ जाने-तमन्ना प्यार से 
                         तंग आ जाऊँ न वरना इश्क़ के आज़ार से 

                          हमसफ़र तेरी रफ़ाक़त लेके आई शहर में 
                           मैं तो वाक़िफ़ ही न था इन कूचा-ओ-बाज़ार से 

                          मैं तो राहों में तेरा नक़्शे-क़दम देखा किया 
                          क़ाफ़िले गुज़रा किये सब गर्मी-ए-रफ़्तार से 

                          इस खता पर नाम तेरा लब पे आया बार-बार 
                          मैं उठाया जा रहा हूँ महफ़िले-अग़्यार से 

                         गूंगे-बहरे पत्थरों से होगा इक दिन राज़-फ़ाश 
                         पूछता हूँ मैं पता तेरा दरो-दीवार से 

                         ले चलो कश्ती किनारे पर कि मंज़िल आ गई 
                         खेलते कब तक रहोगे 'माँझी' इस पतवार से 
                                                                      -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. जाने-तमन्ना=इच्छा या चाहत की जान अर्थात् प्रेयसी, 2. आज़ार=रोग, 3. रफ़ाक़त=दोस्ती, 4. कूचा-ओ-बाज़ार=गली और बाज़ार, 5. नक़्शे-क़दम=पाँव के निशान, 6. गर्मी-ए-रफ़्तार=गति की तेज़ी, तीव्र गति, 7. अग़्यार='ग़ैर' का बहुवचन, जो स्वजन नहीं हों, प्रतिद्वन्द्वी जन, रक़ीब लोग, 8. राज़-फ़ाश=रहस्य खुलना। 

('क्यों सभी ख़ामोश है' से)

Dekh le jii bhar ke ai jaan-e-tamannaa pyaar se
Ta'ng aa jaau'n na varna ishq ke aazaar se

Hamsafar teri rafaaqat le ke aa.ii shahar mein
Mai'n to vaaqif hii na tha in koochaa-o-baazaar se

Mai'n to raaho'n me'n tera naqsh-e-qadam dekha kiya
Qaafile guzraa kiye sab garmii-e-raftaar se

Is khataa par naam tera lab pe aayaa baar-baar
Mai'n uTHaayaa jaa rahaa hu'n mahfil-e-aghyaar se

Goo'nge-bahre pattharo'n se hoga ik din raaz faash
Puuchhta hu'n mai'n pataa tera dar-o-deevar se

Le chalo kashtii kinaare par ki manzil aa ga.ii
Khelte kab tak rahoge 'Manjhi' is patvaar se

Tuesday, September 8, 2015



 194.   प्यार का जादू जगाता रहा हौले-हौले 


                         प्यार का जादू जगाता रहा हौले-हौले
                         गुदगुदी दिल में उठाता रहा हौले-हौले 

                         तेज़-रफ़्तार हवाओं से वो टकराता हुआ 
                         कारवाँ आगे बढ़ाता  रहा हौले-हौले 

                         जाने क्यों रात गए तक पसे-दीवार कोई 
                         दास्ताँ अपनी सुनाता  रहा हौले-हौले 

                         उम्र-भर दर्द की तारिक गुज़रगाहों में 
                         याद कि शम्अ़ जलाता रहा हौले-हौले 

                         आने वाले के लिये छोड़कर सारी दुनिया 
                         जाने वालों को बुलाता रहा हौले-हौले 

                        सर्द लहरों से तेरा नाव में बैठा 'माँझी'
                        आग दरिया में लगाता रहा हौले-हौले 
                                                        -देवेन्द्र माँझी 

शब्दार्थ--1. पसे-दीवार=दीवार के पीछे, 2. तारिक गुज़रगाहों में=अँधेरे भरे रास्ते में। 

('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
इस ग़ज़ल को रोमन में भाई विवेक नारायण ( लखनऊ) ने किया है--

Pyaar ka jaadoo jagaata rahaa haule-haule

Gudgudii dil me'n uTHaataa rahaa haule-haule

Tez-raftaar havaao'n se vo takraataa hu.aa
Kaarvaa'n aage baDHaataa rahaa haule-haule

Jaane kyo'n raat gaye tak pas-e-deevaar koi
Daastaa'n apnii sunaataa rahaa haule-haule

Umr-bhar dard kii taareek guzargaaho'n me'n
Yaad kii sham.a jalaataa rahaa haule-haule

Aane vaale ke liye chhoRRkar saarii duniyaa
Jaane vaalo'n ko bulaataa rahaa haule-haule

Sard lahro'n se teraa naav me'n baiTHaa 'Manjhi'
Aag dariyaa me'n lagaataa rahaa haule-haule

-devendra maa'njhii

1. Pas-e-deevaar = Deevaar ke piichhe
2. Taariik guzargaaho'n me'n = andhere bhare raasto'n me'n

('Kyo'n sabhii khaamosh hai'n' se)