190. जब भी एहसास हुआ है मुझको
जब भी एहसास हुआ है मुझको
उसने फिर याद किया है मुझको
जिस्म पत्थर का हुआ जाता है
किसने चुपके से छुआ है मुझको
मैंने कुछ और सुना है शायद
उसने कुछ और कहा है मुझको
अन्धे दरिया में बहाने के लिए
उसने इक फूल दिया है मुझको
छोड़कर लहर ने साहिल 'माँझी'
अपने घेरे में लिया है मुझको
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment