205. देखें क्या शहरे-आरज़ू चलके
देखें क्या शहरे-आरज़ू चल के
हो गए राख सारे घर जल के
ढूँढ़ते हो चिराग़ लेकर क्या
चाँद पहुँचा गुफाओं में ढल के
दास्ताँ दर्द की सुनाने को
रह गए आज भी खंडर कल के
कोई दीवाना इल्तिजा लेकर
धूल आया है जिस्म पर मल के
जब भी सूरज ज़वाल पर आया
दूर तक पहुँचे साये पीपल के
नाव भी डगमगा गई 'माँझी'
मेरी आँखों से अश्क जब छलके
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शहरे-आरज़ू=इच्छाओं का नगर, 2. खंडर=खण्डहर, 3. इल्तिजा=प्रार्थना, 4. ज़वाल=गिराव, ढलाव।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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