203. वो तअ़क़्क़ुब में था लुटा कैसे
वो तअ़क़्क़ुब में था लुटा कैसे
पीछे मुड़कर मैं देखता कैसे
तेरे बीमार ने शिफ़ा पाई
अब करेगी असर दवा कैसे
बढ़ गया इतना शाम होते ही
तेरी ज़ुल्फ़ों का सिलसिला कैसे
इन ख़ुदाओं के दरम्याँ रहकर
कोई माँगेगा अब दुआ़ कैसे
'माँझी' सोया हुआ है दरिया में
मौज दिखलाये अब अदा कैसे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. तअ़क़्क़ुब=पीछा करता हुआ, 2. शिफ़ा=रोगमुक्ति, 3.मौज=लहर।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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