74. होंठ बेशक बन्द हैं, बेशक ज़बाँ है चुप
होंठ बेशक बन्द हैं, बेशक ज़बाँ है चुप
बोलती हैं आँख जिसकी वो कहाँ है चुप
सोचकर शायद यही सारा जहाँ है चुप
वो सुख़नवर है बड़ा जिसकी ज़बाँ है चुप
उसके दोनों पहलुओं का ये नज़ारा है
तीर खेले खेल अपना और
No comments:
Post a Comment