206. स्याह परदे में छुप गया कोई
स्याह परदे में छुप गया कोई
ये सितमपेशा बेवफ़ा है कोई
सूने-सूने हैं कूचा-ओ-बाज़ार
शहर में हादिसा हुआ है कोई
लोग मिलने से जी चुराते हैं
दोस्तों की ये बददुआ है कोई
मुन्तज़िर शाम के धुँधलके में
टिमटिमाता हुआ दीया है कोई
बूढ़े बरगद की छाँव में शायद
काफ़िला दर्द का रुका है कोई
नाव साहिल पे लेके चल 'माँझी'
पीछे तूफ़ान आ रहा है कोई
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. सितमपेशा=अत्याचार करनेवाला, ज़ुल्म ढानेवाला, 2. बेवफ़ा=अकृतज्ञ, 3. कूचा-ओ-बाज़ार=बाज़ार और गालियाँ, 4. मुन्तज़िर=प्रतीक्षारत।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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