Thursday, June 30, 2016

352. तेरा राह बताना देखा 


तेरा राह बताना देखा
मंज़िल से भटकाना देखा

देह चीरकर अँधियारे की
सूरज का इठलाना देखा

हर युग के चौराहे पर ही
तेरा आना-जाना देखा

सब की चाहत में रहता जो
ख़ुद से ही अंजाना देखा

बीच भँवर में मैंने 'माँझी'
मौजों का बल खाना देखा
                -देवेन्द्र माँझी

Teraa raah bataana dekhaa
Manzil se bhaT.kaana dekhaa

Deh cheerkar andhiyaare kee
Sooraj ka iTHlaana dekhaa

Har yug ke chauraahe par hi
Tera aanaa-jaanaa dekhaa

Sab ki chaahat meiN rahtaa jo
KHud se hi anjaanaa dekhaa

Beech bhaNwar meiN maiN'ne 'Manjhi'
MaujoN ka bal khaana dekha

                          ~ Devender Manjhi

Wednesday, June 29, 2016

351. क्या बताऊँ दोस्तो कैसा हूँ मैं 


क्या बताऊँ दोस्तो कैसा हूँ मैं
रूह के ज़ख़्मों से शर्मिन्दा हूँ मैं

एक अर्से से यहाँ ठहरा हूँ मैं
शुक्रिया अय दोस्तों ! चलता हूँ मैं

आईने के साथ भी तन्हा हूँ मैं
चलती-फिरती लाश-सा रहता हूँ मैं

तुम हो चेहरे और मुखौटे वक़्त के
टूटकर बिखरा हुआ शीशा हूँ मैं

ले चलो 'माँझी' मुझे दरियाओं में
हर समय साहिल पे ये कहता हूँ मैं
                       -देवेन्द्र माँझी

Kyaa bataauuN dosto kaisaa hooN maiN ...
Rooh ke zaKHmoN se sarmindaa hooN maiN ...

Ek arse se yahaaN THahraa hooN maiN ...
Shukriya aiy dostoN ! Chaltaa hooN maiN ...

Aaiine ke saath bhi tanhaa hooN maiN ...
Chaltee-phirtee laash sa rahtaa hooN maiN ...

Tum ho chehre aur mukhauTe waqt ke ...
TooT kar bikhraa huaa shiishaa hooN maiN ...

Le chalo 'Manjhi' mujhe dariyaaoN meiN ...
Har samay saahil pe ye kahtaa hooN maiN ...

                                          ~ Devender Manjhi

Sunday, June 26, 2016

350. टूटे हुए दिलों के हवाले मिले बहुत 


टूटे हुए दिलों के हवाले मिले बहुत
इन रास्तों में अन्धे उजाले मिले बहुत

तन्हा गुजरने वालों में तन्हा नहीं रहा
तेरी गली के चाहने वाले मिले बहुत

मैं ख़ुशनसीब था  खण्डर से निकल गया
ख़ूंख़ार मकड़ियों के भी जाले मिले बहुत

उजले लिबास देखने में ही भले लगे
किरदार उनके शहर में काले मिले बहुत

'माँझी' की नाव झील से वाबस्ता हो गई
सहरा में और भी नदी-नाले मिले बहुत
                              -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Toote hue dilon ke havaale mile bahut ...
In raaston mein andhe ujaale mile bahut ...

Tanhaa guzarne waaloN meiN tanhaa nahiiN rahaa ...
Teri galii ke chaahne waale mile bahut ...

MaiN KHushnaseeb thaa khaNDar se nikal gayaa ...
KhooNkhaar makDiyoN ke bhi jaale mile bahut ...

Ujle libaas dekhne mein hi bhale lagey ...
Kirdaar un ke shahar mein kaaley mile bahut ...

'Manjhi' ki naav jheel se vaabastaa ho gayee ...
Sahraa mein aur bhi nadi-naale mile bahut ...

                                      - Devender Manjhi

Monday, June 20, 2016

349.  आपका इस ओर से जब रास्ता होता गया 


आपका इस ओर से जब रास्ता होता गया
साँस लेना जुर्म जीना हादिसा होता गया

ये नगर बस दाद देता है मेरे अशआर पर
कौन जाने क्या था मैं और क्या से क्या होता गया

चिलचिलाती धूप आकर जब पड़ी सर पर मेरे
एक पैकर छाँव का मुझसे अता होता गया

आग की लपटें लिये दुनिया को झुलसाता रहा
पास आकर मेरे क्यों वो बर्फ़ सा होता गया

नाव 'माँझी' जब बढ़ी दरियाओं की गहराई में
तेज़ तूफ़ानों से मेरा सामना होता रहा
                                 -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. अशआर=ग़ज़ल  शेर का बहुवचन, 2. अता=प्रदान अर्थात
जब धूप मेरे सर पर पड़ी तो मैं छाँव देता रहा।

(हादिसा हूँ मैं'से)

Sunday, June 19, 2016

348. बाप की ख़्वाहिश है ये उसका पिसर ज़िन्दा रहे 


बाप की ख़्वाहिश है ये उसका पिसर ज़िन्दा रहे
मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा हुनर ज़िन्दा रहे

कौन छोड़ेगा भला फूलों को फिर यूँ शाख़ पर
जब तलक भी हो सके काँटों का डर ज़िन्दा रहे

बात फिर पैदा नहीं होती कहीं तकलीफ़ की
इन ख़यालों में अगर सच्चा समर ज़िन्दा रहे

कौन जाने वक़्त कब करवट ले कैसी इसलिए
हो भी जाए दुश्मनी तो इक अगर ज़िन्दा रहे
                                         -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)
Baap ki KHwaahish hai ye uskaa pisar zindaa rahe
MaiN rahooN ya na rahooN, mera hunar zindaa rahe

Kaun chhoDegaa bhalaa phooloN ko phir yuuN shaaKh par
Jab talak bhi ho sake kaaNtoN ka Dar zinda rahe

Baat phir paidaa nahiiN hoti kahiiN takleef kii
In KHayaaloN meiN agar sachchaa samar zinda rahe

Kaun jaane waqt kab karvat le kaisee isliye
Ho bhi jaaye dushmani to iker agar zinda rahe

                                    ~ Decender Manjhi

Thursday, June 16, 2016

347. अफ़वाहों की तेज़ हवा में सच का दीपक बुझता है 


अफ़वाहों की तेज़ हवा में सच का दीपक बुझता है
आवारा बादल के पीछे जैसे सूरज छिपता है

देखो वो दीवाना है या पागल है कुछ तो है वो
घुप्प अँधेरे में बैठा जो दिन की पाती लिखता है

कौन ख़रीदेगा अब इनको, क़ीमत इनकी है भी क्या
जिस्म और ईमान सभी कुछ गली-गली में बिकता है

नाव और पतवार से रिश्ता तर्क किया है उसने अब
तट पर बैठा-बैठा 'माँझी' लहरों को ही गिनता है
                                        -देवेन्द्र माँझी

Tuesday, June 14, 2016

346. धूप तेरी याद की जब भी ढली अय हमनवा 


धूप तेरी याद की जब भी ढली अय हमनवा
तब किसी साये ने कर ली ख़ुदकुशी अय हमनवा

शोर है सारे नगर में बस इसी इक बात का
दुश्मनों से कर ली हमने दोस्ती अय हमनवा

मैंने तो कुछ भी नहीं उससे कहा ईमान से
बात ये बेबात में ही चल पड़ी अय हमनवा

कौन जाने कल इसे बतला गया क्या आईना
ख़ुद-ब-ख़ुद शरमा गई ये ज़िन्दगी अय हमनवा

छोड़कर साहिल को 'माँझी' दूर सागर में गया
जब कभी लहरों पे ये कश्ती चली अय हमनवा
                                     -देवेन्द्र माँझी

Monday, June 13, 2016

345. अब  हमसे बतियाये कौन ?


अब हमसे बतियाये कौन ?
अपना वक़्त गँवाये कौन ?

आँगन में दहशत फ़ैली
सन्नाटा सरकाये कौन ?

बुत मन्दिर में व्याकुल हैं
दीपक लेकर आये कौन ?

बात-बात पर रोता है
इस दिल को समझाये कौन ?

दिन में ही सब होता है
अपनी रात जगाये कौन ?

जलती हैं लहरों की आँख
'माँझी' बनकर आये कौन ?
                 -देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)

Ab hamse batiyaa.ye kaun ?
Apna waqt gaNvaaye kaun ?

AaNgan meiN dehshat phailee
SannaaTaa sarkaaye kaun ?

But mandir meiN vyaakul haiN
Deepak lekar aaye kaun ?

Baat-baat par rotaa hai
Is dil ko samjhaaye kaun ?

Din meiN hi sab hotaa hai
Apnii raat jagaaye kaun ?

Jaltee haiN lehroN kii aaNkh
"Manjhi" ban kar aaye kaun ?

               ~ Devender Manjhi

Sunday, June 12, 2016

344. उसकी तस्वीर ही जब गर्दिशे-अय्याम सी है 


 उसकी तस्वीर ही जब गर्दिशे-अय्याम सी है
सारी दुनिया ही क्या इश्क़ में नाकाम सी है

दोस्तो ! तुम मुझे नुक्कड़ पे खड़ा रहने दो
ये गली शहर में पहले ही से बदनाम सी है

कौन आबाद है इन रेत के सहराओं में
ऊँचे टीलों की ये परछाईं दरो-बाम सी है

इन्तिज़ार-ए-शबे-ग़म इतना बता दूँ तुझको
दिन निकलते ही हर इक छाँव मुझे शाम सी है

दो दिलों में ये मुहब्बत का नशा सा तो नहीं
तेरी आँखों में ये सुर्ख़ी किसी इल्ज़ाम सी है

मुझसे मत पूछ कि क्या होना है आगे चलकर
इब्तिदा ही तेरे आग़ाज़ की अंजाम सी है

होशियारी से ही साहिल पे लगाना कश्ती
झील ये 'माँझी' छलकता हुआ इक जाम सी है
                                       -देवेन्द्र माँझी

शब्दार्थ--1. सहराओं=रेगिस्तानों, 2. दरो-बाम=दरवाज़े और छत,
3. इब्तिदा=शुरुआत, 4. आग़ाज़=कार्य का प्रारम्भ करना।

(हादिसा हूँ मैं' से)

Thursday, June 9, 2016

343. मन की दूरी मिटा सकोगे तुम ?


मन की दूरी मिटा सकोगे तुम ?
इतना नज़दीक आ सकोगे तुम ?

ढूँढ पाए न कोई भी तुमको
मुझमें ऐसे समा सकोगे तुम ?

खोलकर खिड़कियाँ अँधेरे की
धूप घर में बुला सकोगे तुम ?

अपनी करनी के बाद महफ़िल में
अपना चेहरा दिखा सकोगे तुम ?

शान्त सागर में आज फिर 'माँझी'
कोई तूफ़ान ला सकोगे तुम ?
                            -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Man ki doorii miTaa sakoge tum ?
Itnaa nazdeek aa sakoge tum ?

DHooNDH paaye na koi bhi tumko
Mujh meiN aise samaa sakoge tum ?

Khol kar khiDkiyaaN andhere ki
Dhoop ghar meiN bulaa sakoge tum ?

Apnee karnee ke baad mehfil meiN
Apnaa chehraa dikhaa sakoge tum ?

ShaaNt saagar meiN aaj phir 'Manjhi'
Koi toofaan laa sakoge tum ?

~ Devender Manjhi

Wednesday, June 8, 2016

342. जब वो सुनता है मेरे नाम का चर्चा अक्सर 


जब वो सुनता है मेरे नाम का चर्चा अक्सर
काट   लेता   है   उसे   एक   ततैया अक्सर

जिसने जीने का सलीक़ा ही बदल डाला था
याद आता है मुझे प्यार वो पहला अक्सर

कौन-से जन्म का ये वैर निकाले मुझसे
मुझको हँसने ही नहीं देता है शीशा अक्सर

कुछ तो एे वक़्त के चौराहो बताओ मुझको
बन के रह जाता हूँ क्यों मैं ही तमाशा अक्सर

जीत की बाज़ी भी हारी है सदा मैंने ही
चूक जाता है क्यों मेरा ही निशाना अक्सर

याद 'माँझी' को कबीरा का ही दोहा आये
देखकर दूर से पानी का बबूला अक्सर
                              -देवेन्द्र माँझी

(हादिसा हूँ मैं' से)

Monday, June 6, 2016

341. ख़ुद को साफ़ बचा लो तुम 


ख़ुद को साफ़ बचा लो तुम
वहम न दिल में पालो तुम

मैं तो इनसे ऊब गया
मेरे ख़्वाब सम्हालो तुम

चुप सबकी मजबूरी हो
ऐसा प्रश्न उछालो तुम

अँधियारे को शरण न दे
दीपक को समझालो तुम

आने वाला है तूफ़ान
'मांझी' नाव सम्हालो तुम
                    -देवेन्द्र माँझी

Thursday, June 2, 2016

340. तूने बदल के रख दिए मानी तमीज़ के 


तूने बदल के रख दिए मानी तमीज़ के
टूटे हैं दो बटन अगर मेरी क़मीज़ के

अपने सभी उसूल अब रक्खो भी अपने पास
बच्चों ने कह दी बात ये पापा से खीज के

दम तोड़ते हुए भी है तेरी ही रट लिए
क़िस्से सुने नहीं कभी ऐसे मरीज के

मुझको अजीब लग रहा है माजरा सभी
कैसे गिनाऊँ दोष मैं अपने अज़ीज़ के

कश्ती सम्हाल पाये कब चप्पू चलाये वो
'माँझी' बना हुआ है जो पानी में भीज के
                                -देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. मानी=अर्थ, मतलब, 2. तमीज़=शिष्टता, तहज़ीब, 3. अज़ीज़=प्रिय, 4. भीज के=भीगकर। 

Too ne badal ke rakh diye maani tameez ke
TooTe haiN do 'button' agar meri qameez ke

Apne sabhi usool ab rakkho bhi apne paas
BachchoN ne kah di baat ye papa se kheej ke

Dam toD.te hue bhi hai teri hi raT liye
Qisse sune nahiiN kabhi aise mareej ke

Mujh ko ajeeb lag rahaa hai maajraa sabhi
Kaise ginaauN dosh maiN apne azeez ke

Kashtee samhaal paaye kab chappuu chalaaye vo
'Manjhi' banaa huaa hai jo paani meiN bheej ke

~ Devender Manjhi

Bheej ke = bheeg kar, tar-ba-tar hokar