344. उसकी तस्वीर ही जब गर्दिशे-अय्याम सी है
उसकी तस्वीर ही जब गर्दिशे-अय्याम सी है
सारी दुनिया ही क्या इश्क़ में नाकाम सी है
दोस्तो ! तुम मुझे नुक्कड़ पे खड़ा रहने दो
ये गली शहर में पहले ही से बदनाम सी है
कौन आबाद है इन रेत के सहराओं में
ऊँचे टीलों की ये परछाईं दरो-बाम सी है
इन्तिज़ार-ए-शबे-ग़म इतना बता दूँ तुझको
दिन निकलते ही हर इक छाँव मुझे शाम सी है
दो दिलों में ये मुहब्बत का नशा सा तो नहीं
तेरी आँखों में ये सुर्ख़ी किसी इल्ज़ाम सी है
मुझसे मत पूछ कि क्या होना है आगे चलकर
इब्तिदा ही तेरे आग़ाज़ की अंजाम सी है
होशियारी से ही साहिल पे लगाना कश्ती
झील ये 'माँझी' छलकता हुआ इक जाम सी है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. सहराओं=रेगिस्तानों, 2. दरो-बाम=दरवाज़े और छत,
3. इब्तिदा=शुरुआत, 4. आग़ाज़=कार्य का प्रारम्भ करना।
(हादिसा हूँ मैं' से)
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