342. जब वो सुनता है मेरे नाम का चर्चा अक्सर
जब वो सुनता है मेरे नाम का चर्चा अक्सर
काट लेता है उसे एक ततैया अक्सर
जिसने जीने का सलीक़ा ही बदल डाला था
याद आता है मुझे प्यार वो पहला अक्सर
कौन-से जन्म का ये वैर निकाले मुझसे
मुझको हँसने ही नहीं देता है शीशा अक्सर
कुछ तो एे वक़्त के चौराहो बताओ मुझको
बन के रह जाता हूँ क्यों मैं ही तमाशा अक्सर
जीत की बाज़ी भी हारी है सदा मैंने ही
चूक जाता है क्यों मेरा ही निशाना अक्सर
याद 'माँझी' को कबीरा का ही दोहा आये
देखकर दूर से पानी का बबूला अक्सर
-देवेन्द्र माँझी
(हादिसा हूँ मैं' से)
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