मेरे तीसरे ग़ज़ल-संग्रह "क्यों सभी ख़ामोश हैं" में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. शेरजंग की लिखी भूमिका। यह संग्रह वर्ष-1989 में "अयन प्रकाशन, 1/ 20 महरौली, नई दिल्ली-110030" ने प्रकाशित किया था।
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देवेन्द्र माँझी की ग़ज़लें
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आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व जब मैंने ग़ज़ल कहना प्रारम्भ किया था तो उसके पीछे काव्य-रचना में मेरी रूचि तथा उर्दू के पठन-पाठन और हिन्दी में ग़ज़ल कहनेवाले शम्भूनाथ शेष, हरिकृष्ण प्रेमी, बलबीर सिंह "रंग" का प्रभाव अत्यन्त गहन रूप में था। वक़्त आगे बढ़ता गया और हिन्दी कवियों पर भी ग़ज़लों का प्रभाव इस क़दर बढ़ा कि ग़ज़ल का कहना या लिखना ख़ासा मुश्किल कार्य होते हुए भी, प्रत्येक उभरते हुए कवि की कामना का हिस्सा बन गया; उसकी इच्छा होती चली गई कि वह ग़ज़लें ज़रूर कहे। एक-एक शेर जोड़कर पूरी ग़ज़ल लिखना-कहना अपने आपमें सचमुच ही अनोखा कवि-कर्म है (हमारे मित्र नरेन्द्र वशिष्ठ ने तो ऐसे शेरों की एक पूरी किताब "क़तरा-क़तरा" नाम से छपवाई है, जिसके अधिकांश शेर किसी ग़ज़ल के हिस्से नहीं हैं)। मेरे विचार से ग़ज़ल की सबसे बड़ी ताक़त है उसका पुर-असर अंदाज़े-बयाँ, जो सुनने-पढ़ने वाले के दिलो-दिमाग़ पर छा जाता है और भुलाये नहीं भूलता।
कविता के अपेक्षाकृत संक्षिप्तीकरण की अपेक्षा को जटिल जीवन की व्यस्तता ने और अधिक बढ़ा दिया है, इसलिए ग़ज़ल-लेखन और पठन-पाठन की ओर झुकाव का बढ़ना अस्वाभाविक नहीं है। बहुत-सी भारतीय भाषाओं में ग़ज़लें बड़ी मात्रा में लिखी जा रही हैं। मगर हाँ, यह सब शायर की क्षमता, सहृदयता, काव्य-कौशल, गहन अनुभूति, शाब्दिक-मितव्ययता और अंदाज़े-बयाँ पर निर्भर करता है कि वह अपनी बात को कितनी ख़ूबसूरती से कह पाता है।
ग़ज़ल-लेखन के मामले में देवेन्द्र माँझी एकदम नए तो नहीं हैं। उनके दो ग़ज़ल-संकलन "समन्दर के दायरे" और "मजबूरियाँ मेरी" इससे पूर्व छपकर चर्चा का विषय बन चुके हैं। एक चर्चित कवि द्वारा अपनी ग़ज़लों पर कुछ कहने-लिखने की इच्छा व्यक्त किया जाना मेरे लिए भी कम सुखद नहीं है।
देवेन्द्र माँझी के कवि का विकास हिन्दी-उर्दू की सम्मिलित भावभूमि पर हुआ है। देवेन्द्र माँझी का वास्तविक नाम देवेन्द्र गोयल है और वे हरियाणा के वासी हैं, जहाँ गीतों, लोकगीतों की बहुतायत के बावजूद ग़ज़लों की भी कमी नहीं है, बल्कि वहाँ के लोग ग़ज़ल से कुछ ज़्यादा ही जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि "माँझी" की भाषा-शैली में हिन्दी-उर्दू का मिला-जुला रंग उनकी ग़ज़लों को बहुत आसान, मगर प्रभावशाली बनाने की क्षमता रखता है। उनमें ग़ज़ल के सम्पूर्ण अनुशासन की समझ है और वह मत्ला, क़ाफ़िया, रदीफ़ का निर्वाह भी पर्याप्त सुन्दरता से करने में सक्षम हैं।
देवेन्द्र माँझी की ग़ज़लों में वर्तमान जीवन की चुनौतियाँ, तल्खियाँ, तकलीफें तो विद्यमान हैं ही, प्रेम की कोमल अनुभूतियाँ भी जगह-जगह अपना रंग बिखेर रही हैं। उनके बहुत-से श्रेष्ठ अशआर में-से कुछ को उद्धृत करने का लोभ संवरण करना मुश्किल है--
"याद के बिस्तर पे बढ़ती जा रही हैं सिलवटें
कौन तन्हाई में मेरे साथ आकर सो गया"
"हिज्र की रात में आवाज़ मैं दूँगा तुझको
गर मुहब्बत है तो हर हाल में आना होगा'
वो तो इक याद का पैकर था जो भूले-भटके
मुझको देता रहा रुक-रुकके सदा रात गए"
"संसद के भीतर और बाहर एक बहस है छिड़ी हुई
किसने लूटा नैतिकता को कौन लुटेरा आया था?
संकलन में इस क़िस्म के अनेक प्रभावकारी, चुभनेवाले और मुग्ध करनेवाले शेर मौजूद हैं। मेरे विचार में देवेन्द्र माँझी की ग़ज़लोंकी सबसे बड़ी विशेषता है उनके द्वारा ग़ज़ल में " मक़्ता" का बेहतरीन निबाह किया जाना। "माँझी" उपनाम को उन्होंने अपनी अधिकांश ग़ज़लों के मक़्तों में इतनी ख़ूबी से पिरोया है कि दाद दिए बिना रहना मुश्किल है। हिन्दी में बलबीर सिंह "रंग" ने अपने उपनाम को मक़्तों में जड़कर जो सफलता और यश अर्जित किया था, उसकी अगली कड़ी के रूप में देवेन्द्र माँझी को निश्चित ही रखा जा सकता है। बानगी के तौर पर---
"नाव को तेज़ कर चलो माँझी
अब तो लहरों के नाग डसते हैं"
"माँझी बढ़ती है नाव साहिल पर
जब भी पतवार रक़्स करती है"
"सर्द लहरों से मगर नाव में बैठा माँझी
आग दरिया में लगाता रहा हौले-हौले'
"आसाँ नहीं था नाव को तूफ़ाँ से खींचना
माँझी सिमट-सिमट के बिखरना पड़ा मुझे'
वास्तव में देवेन्द्र माँझी ने लहर, तूफ़ान, सागर, नाव, दरिया, पतवार और मंझधार के प्रतीकों का सहारा लेकर "माँझी' उपनाम को अपनी ग़ज़लों के मक़्तों की अँगूठी में नगीने की तरह जड़ने का कौशल दर्शाया है, मुग्ध करता है।
हिन्दी नई पीढ़ी के श्रेष्ठ ग़ज़लकारों यथा सूर्यभानु गुप्त, शिवओम अम्बर, सत्यप्रकाश शर्मा, हरजीत सिंह आदि के साथ-साथ देवेन्द्र माँझी भी चोखी, चुभती, सम्प्रेषणीय तथा आधुनिक मन की व्यथा को वाणी देनेवाली गज़लें लिखने-कहने में निरंतर संघर्षशील हैं। उनमें अपार सम्भावनाएँ हैं। देखना है कि ये सम्भावनाएँउनकी भावी रचनाओं में किस सीमा तक पार जाती हैं।
---डा. शेरजंग गर्ग,
जी-261-ए, सैक्टर-22
नॉएडा-201301 (उ.प्र.)
16, जनवरी-1989