153. इसी भँवर से हर एक शख़्स को गुज़रना है
इसी भँवर से हर एक शख़्स को गुज़रना है
हिसार पानिओं का टूटकर बिखरना है
तू सख़्त और सज़ा दे मेरी सच्चाई पर
ये ज़ुर्म है तो मुझे बार-बार करना है
तेरे फ़िराक़ में रो-रोके एक दिन ऐ दोस्त
ये सारा दश्त मुझे आँसुओं से भरना है
ये सोचकर मैं कभी छाँव में नहीं बैठा
गई-रुतों का यहाँ काफ़िला ठहरना है
बहुत-से लोग हैं टूटी-सी नाव में "माँझी"
उभरते-डूबते दरिया के पार उतरना है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हिसार=घेरा, परिधि, दुर्ग, क़िला, 2. फ़िराक़=जुदाई, विरह, बिछोह, 3. दश्त=जंगल, 4. गई-रुतों=बीता हुआ मौसम।
("समन्दर के दायरे" से)
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