140. रहे-उल्फ़त में काँटे बो गए हैं
रहे-उल्फ़त में काँटे बो गए हैं
बहुत से लोग आकर रो गए हैं
तुम्हारे ढूँढने वाले हज़ारों
इसी दस्ते-तलब में खो गए हैं
सदा दीवारो-दर से लौट आई
वो गहरी नींद शायद सो गए हैं
छुपकर मुँह गरीबानों में अपना
वो चुपके से ही दामन धो गए हैं
जो तूफानों से घबराते थे "माँझी"
समन्दर के ही अक्सर हो गए हैं
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. रहे-उल्फ़त में=प्यार के रास्ते में, 2. दस्ते-तलब में=चाहत के जंगल में, 3.सदा=आवाज़, 4. दीवारो-दर=दीवार और दरवाज़ा, 5. गरीबानों में=गिरेबान में।
("समन्दर के दायरे" से)
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