163. सुमसान जंगलों में बुलाता मैं किस तरह
सुमसान जंगलों में बुलाता मैं किस तरह
जब रूठ ही गए तो मनाता मैं किस तरह
यादों की रौशनी तो उसी से मिली मुझे
फूँकों से उस दिये को बुझाता मैं किस तरह
तेरी अमानतें तो हैं दिल में छुपी हुईं
ज़ख़्मों को आईने में दिखाता मैं किस तरह
सब काफ़िलों के नक़्शे-कफे-पा उदास थे
मटियाले रास्तों को सजाता मैं किस तरह
"माँझी" अकेली नाव को साहिल पे छोड़कर
सोई हुई नदी को जगाता मैं किस तरह
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. नक़्शे-कफे-पा=तलुवों के निशान।
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