167. किसने चेहरे का अक्स उछाला है
किसने चेहरे का अक्स उछाला है
मैंने मुश्किल से दिल सम्हाला है
दूर ले जाओ इस सुराही को
मैंने दरियाओं को खंगाला है
नींद की बस्तिओं में खो जाओ
दिन नहीं, रात का उजाला है
और दीवाने थे बहुत लेकिन
मुझको ही शहर निकाला है
आ भी जा, आ भी जा कि तेरे बग़ैर
सारी महफ़िल का रंग काला है
नाव बढाती नहीं मेरी "माँझी"
कैसा लहरों ने जाल डाला है
-देवेन्द्र माँझी
("समन्दर का दायरे" से)
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