146. एक सूरत मुझे भोली-भाली मिली
एक सूरत मुझे भोली-भाली मिली
प्यार से ज़िन्दगी उसकी खाली मिली
जिसको तूने हमेशा उजाले दिए
उस बियाबान में धूप काली मिली
मैं अकेला न था हाथ उठाये हुए
सारी दुनिया ही मुझको सवाली मिली
ज़ुल्फ़-ए-अम्बर को ऐसे निचोड़ा गया
ख़ुश्बुओं से अटी सारी नाली मिली
जिसकी दोशीज़गी पर मुझे नाज़ था
उसके लब पर शफ़क़-जैसी लाली मिली
मौज समझा था "माँझी" भँवर में जिसे
वो लरजती हुई ख़ुश्क डाली मिली
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ज़ुल्फ़-ए-अम्बर=खुशबू वाली लटें, 2. दोशीज़गी पर=कुँवारेपन पर, 3. शफ़क़-जैसी लाली=उषा की सी लालिमा।
("समन्दर के दायरे" से)
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