169. हुआ है कैसे ये मुझको बता तू
हुआ है कैसे ये मुझको बता तू
हक़ीक़त का कोई शीशा दिखा तू
ये क्यों ख़ामोश हैं दश्तो-बयाबाँ
ग़ज़ाला की यहाँ बस्ती बसा तू
मज़ा आता है मुझको भी इसी में
कि जितना हो सके मुझको सता तू
चमन में आज ही ऐसा हुआ है
शिगूफ़ा छोड़ आया बिन खिला तू
संभल "माँझी" उठा पतवार अपनी
निशाना फिर से मौजों को बना तू
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. दश्तो-बयाबाँ =जंगल और उजाड़, 2. ग़ज़ाला=हिरन, 3. शिगूफ़ा=कली; नई बात, अचम्भे की बात।
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
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