151. देखकर आपका ये रूप सुनहरा जैसे
देखकर आपका ये रूप सुनहरा जैसे
याद आने लगा वो चाँद सा चेहरा जैसे
मैंने चढ़-चढ़के फ़सीलों पे सदायें दी हैं
कोई सुनता ही न था शहर हो बहरा जैसे
सोचकर बारहा दरवाज़े से लौट आया हूँ
मेरे दुश्मन का हो उस शख़्स पे पहरा जैसे
ऐसे गुज़रा हूँ झुलसते हुए सहराओं से
ठण्डी छाँव में कोई काफ़िला ठहरा जैसे
ज़िन्दगी मौजे-हवादिस में ही गुज़री "माँझी"
नाव के साथ बहे घाव भी गहरा जैसे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. फ़सीलों पे=परकोटों से, शहर की चारदीवारी से, 2. सदायें=आवाज़ें, 3. सहराओं से=रेगिस्तानों से, मरुस्थलों से, 4. काफ़िला=यात्रीदल, 5. मौजे-हवादिस में=दुर्घटनाओं की लहरों में।
("समन्दर के दायरे" से)
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