172. वो भरी बज़्म में आएँगे ये मालूम न था
वो भरी बज़्म में आएँगे ये मालूम न था
मुझको इस हाल में पाएँगे ये मालूम न था
मैंने सोचा था कि ख़ामोश गुज़रने देंगे
आसमाँ सर पे उठाएँगे ये मालूम न था
दोस्ती कैसी है खुलते ही नहीं लब उनके
प्यार वो दिल में छुपाएँगे ये मालूम न था
मेरी पाक़ीज़ा मुहब्बत के फ़साने घर-घर
लोग हँस-हँस के उड़ाएँगे ये मालूम न था
मैंने मुश्किल से ही इस दिल को सम्हाला "माँझी"
ग़ैर से मिल के जलाएँगे ये मालूम न था
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1.बज़्म=महफ़िल, 2. पाक़ीज़ा मुहब्बत=पवित्र प्रेम, 3. फ़साने=कहानियाँ।
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
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