141. हाँफते जिस्म थे कराहों में
हाँफते जिस्म थे कराहों में
लोग मसरूफ़ थे गुनाहों में
वो जो चेहरा था आईने-जैसा
जा छुपा धुंध की पनाहों में
कैसे पहुँचेगा ये सलाम उनको
दुश्मनों की है भीड़ राहों में
इक नज़र में जो तेरे हो बैठे
वो कशिश है तेरी निगाहों में
फूल बहता हुआ कोई "माँझी"
कैसे पहुँचा भँवर की बाहों में
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. मसरूफ़=व्यस्त। 2. कशिश=आकर्षण।
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