179. मिला जो भी उसे बतला रहा हूँ
मिला जो भी उसे बतला रहा हूँ
मैं अनजाने सफ़र से आ रहा हूँ
सफ़र में धूप का मिलना है लाज़िम
मैं अपने आपको समझा रहा हूँ
मची है खलबली शहरे-हवस में
सदा देकर तुझे पछता रहा हूँ
मुहब्बत तोड़ दी जाने-मुहब्बत
तेरी महफ़िल उठकर जा रहा हूँ
मेरी कश्ती को जिसने तोड़ डाला
उसी के गीत "माँझी" गा रहा हूँ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. लाज़िम-ज़रूरी, 2. शहरे-हवस=इच्छाओं का नगर।
("क्यों सभी ख़ामोश" से)
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