180. नग़मा-ए-इश्क़ गुनगुनाये जा
नग़मा-ए-इश्क़ गुनगुनाये जा
दोस्तों से फ़रेब खाये जा
फूल समझा था जिनको काँटे हैं
उनसे दामन को तू बचाये जा
हो अगर कुछ तेरा भला इसमें
रात-दिन मुझको आज़माये जा
मैं कोई रह-नवर्दे-शौक़ नहीं
ख़ूब नक़्शे-क़दम मिटाये जा
राज़े-उल्फ़त है, कोई क़ैद नहीं
जब तलक हो सके छुपाये जा
तुझको दुनिया की क्या पड़ी "माँझी"
नाव दरियाओं में चलाये जा
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. रह-नवर्दे-शौक़=रास्ते में निशान छोड़ने का इच्छुक, 2. नक़्शे-क़दम=पाँव के निशान, 3. राज़े-उल्फ़त=प्रेम का रहस्य।
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