161. दिखला के झलक शहर को वीरान करोगे
दिखला के झलक शहर को वीरान करोगे
तुम मुफ़्त में लोगों को परेशान करोगे
दीवाना बनाकर मुझे पहुँचा दिया घर-घर
इससे भी बड़ा और क्या एहसान करोगे
वो वक़्त भी आएगा कभी ख़लवते-शब में
जब आईने को आईने से हैरान करोगे
जब आन के बैठेगा यहाँ हुस्ने-जहाँताब
इस बज़्म में सब चाक गिरेबान करोगे
"माँझी" न पहुँच पाएगी साहिल पे ये कश्ती
लहरों को अगर शामिले-तूफ़ान करोगे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ख़लवते-शब=रात का सूनापन, रात की तन्हाई, 2. हुस्ने-जहाँताब=संसार का सौंदर्य अर्थात प्रेयसी, 3. चाक गिरेबान=गिरेबाँ फाड़ना, 4. शामिले-तूफ़ान=तूफ़ान में शामिल।
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