166. कैसी हो जाती है गलिओं की फ़ज़ा रात गए
कैसी हो जाती है गलिओं की फ़ज़ा रात गए
ओढ़ लेती है कराहों की रिदा रात गए
चौंक उठता हूँ मैं ये देख के मंज़र सारे
किसने खोली है दरीचे में क़बा रात गए
आओ, हम सब चलें उस जिंस का सौदा करने
आज महकेगी सरे-बज़्म हिना रात गए
वो तो इक याद का पैकर था जो भूले-भटके
मुझको देता रहा रुक-रुकके सदा रात गए
क्या कोई चाँद चला आया नहाने "माँझी"
हो चली मस्त क्यों लहरों की अदा रात गए
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. रिदा=चादर, 2. क़बा=लम्बा चोग़ा, गाउन।
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