154. मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
दुश्मनों को भी पसीना आ गया
अब न ढूँढेंगे रफ़ूगर शहर में
ऐ मुहब्बत चाक सीना आ गया
साक़िया ये सागरो-मीना उठा
मुझको पीने का क़रीना आ गया
मुझको तो इक बूँद पानी है गिराँ
तुझको कैसे ज़हर पीना आ गया
आँख ही उस वक़्त "माँझी" की खुली
जब किनारे पर सफ़ीना आ गया
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. चाक=फताव. फटन, फटा हुआ, 2. गिराँ =भारी।
("समन्दर के दायरे" से)
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