159. रुक गयी जाके खुली छत पे पवन आज की रात
रुक गयी जाके खुली छत पे पवन आज की रात
किसी चन्दा को न लग जाए गहन आज की रात
लोग गलिओं से निकल आये हैं बाज़ारों में
बदला-बदला-सा है अंदाज़े-कुहन आज की रात
बू-ए-गुल आई कहाँ से है ज़रा बतला दे
किसके आँगन में ये महका है चमन आज की रात
कौन याद आया है ख़्वाबों की हसीं वादी में
बढ़ गयी और भी सीने में जलन आज की रात
छोड़ दे नाव ख़यालों के भँवर में "माँझी"
वर्ना रह जाएगी बे-गोरो-कफ़न आज की रात
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. अंदाज़े-कुहन=पुराना अंदाज़, 2. बे-गोरो-कफ़न=बिना कफ़न-दफ़न के।
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