143. हाथों में मेरे ढाल न तलवार बनके आ
हाथों में मेरे ढाल न तलवार बनके आ
गर हो सके तो साया-ए-दीवार बनके आ
दुनिया भी देख ले ज़रा मेरा-तुम्हारा साथ
नफ़रत को छोड़ प्यार का इज़हार बनके आ
इक बार होके जलवानुमां ग़म बढ़ा दिया
इस दिल की अंजुमन में तू ग़मख़्वार बनके आ
हमने तमाम उम्र लगा दी है दांव पर
शतरंज की बिसात पे तू हार बनके आ
लगती नहीं किनारे से "माँझी" तेरे बग़ैर
कश्ती नदी के बीच है पतवार बनके आ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. साया-ए-दीवार=दीवार की परछाईं, 2.इज़हार=प्रकट करना।
No comments:
Post a Comment