147. कौन-सा क़र्ज़ ज़माने का चुकाया हमने
कौन-सा क़र्ज़ ज़माने का चुकाया हमने
आज ख़ुद आपको नीलाम कराया हमने
ये मुहब्बत का करिश्मा था कि कुछ और नहीं
तेरा हर ऐब ज़माने से छुपाया हमने
अब न मिल पाएँगे पाँवों के निशाँ भी उसके
ख़्वाब में डूबके जो वक़्त गँवाया हमने
हम गुनहगार हैं हमको भी सज़ा दे देना
ज़िन्दगी तुझको सुबह-शाम चुराया हमने
हम पे इलज़ाम नहीं आया कभी भी कोई
अपने चहरे को शराफ़त में छुपाया हमने
तेरी ख़ातिर ही गुनहगार हुए शहरे-हवस
हर मसीहा को सूली पे चढ़ाया हमने
चीख़ लहरों की हर-इक दौर में उभरी "माँझी"
जब भी पतवार को दरिया में चलाया हमने
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शहरे-हवस =लालची शहर।
("समन्दर के दायरे" से)
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