170. मेरी आँखों में छाए जा रहे हैं
मेरी आँखों में छाए जा रहे हैं
वो ऐसे याद आये जा रहे हैं
ज़माने ही को हम इल्ज़ाम देंगे
ये क्यों पत्थर उठाये जा रहे हैं
उन्हें रोको न पहुँचें अंजुमन में
ये मेहमाँ बिन बुलाये जा रहे हैं
उतर आया मुँडेरों से ये सूरज
मकाँ से दूर साये जा रहे हैं
नदी के घाट से "माँझी" कहीं चल
यहाँ पर दिल दुखाये जा रहे हैं
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. अंजुमन=महफ़िल।
("क्यों सभी ख़ामोश है" से)
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